मेरिट के सामने तकनीकी गलती गौण: गुजरात हाईकोर्ट ने NRI कोटा के तहत NEET-PG उम्मीदवार के पक्ष में दिया बड़ा आदेश

प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं के बजाय योग्यता (Merit) को प्राथमिकता देते हुए, गुजरात हाईकोर्ट ने मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) को निर्देश दिया है कि वह NRI श्रेणी के तहत NEET-PG प्रवेश के लिए एक योग्य छात्रा के नाम पर विचार करे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आवेदन पत्र में हुई एक “मामूली गलती” के कारण किसी मेधावी छात्र का करियर बर्बाद नहीं होना चाहिए और न ही यह “जीवन भर का पछतावा” बनना चाहिए।

याचिकाकर्ता स्वरा भट्ट एक मेडिकल छात्रा हैं, जिन्होंने नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट-पोस्ट ग्रेजुएट (NEET-PG) की परीक्षा दी थी। वह एनआरआई (NRI) कोटे के तहत पोस्टग्रेजुएट कोर्स में प्रवेश की इच्छुक थीं। निर्धारित कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद, उन्हें मेरिट सूची से बाहर कर दिया गया और प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया। इसका कारण यह था कि वह आवेदन प्रक्रिया के दौरान अपने एनआरआई प्रायोजक (Sponsor) की पासबुक अपलोड करने में विफल रही थीं।

भट्ट ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अधिकारियों—स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत आने वाली MCC—को यह निर्देश देने की मांग की कि उनका नाम पीजी राउंड 3 (2025-26) के लिए पात्र एनआरआई उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया जाए और उन्हें काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी जाए।

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याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्हें केवल एक छोटी सी कमी (lacuna) के आधार पर बाहर किया गया है, जो उनके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा, खासकर तब जब उन्होंने योग्यता के आधार पर अच्छे अंक हासिल किए हैं।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों (MCC/DGHS) के वकील ने बताया कि प्रवेश प्रक्रिया की विंडो सोमवार, 2 फरवरी को दोपहर 12:00 बजे बंद होने वाली थी। चूंकि मामले पर बहस सुबह करीब 11:40 बजे हो रही थी, इसलिए प्रतिवादियों ने सुझाव दिया कि समय की कमी के कारण उनके मामले पर सकारात्मक विचार करना संभव नहीं हो पाएगा।

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न्यायमूर्ति निर्जर देसाई ने प्रवेश की समयसीमा समाप्त होने से मात्र 20 मिनट पहले अपना आदेश सुनाया। कोर्ट ने मामले की तात्कालिकता और छात्रा के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को गंभीरता से लिया।

कोर्ट ने स्वीकार किया कि हालांकि प्रायोजक की पासबुक अपलोड करना अनिवार्य है, लेकिन प्रक्रियात्मक चूक शैक्षणिक योग्यता पर हावी नहीं होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा:

“हालांकि पासबुक अपलोड करने की आवश्यकता अनिवार्य है, लेकिन ऐसी कमी की कीमत एक मेधावी छात्र के करियर को नहीं चुकानी चाहिए, और न ही किसी अधिक मेधावी छात्र के दावे की अनदेखी करके कम मेधावी उम्मीदवार को प्रवेश दिया जाना चाहिए।”

जज ने आगे कहा कि ऐसी “मामूली गलती” याचिकाकर्ता जैसे छात्र के लिए “जीवन भर के पछतावे” का कारण नहीं बननी चाहिए।

हालांकि, कोर्ट ने विशेषज्ञ बनने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों को सटीकता बनाए रखने की चेतावनी भी दी। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में विशेषज्ञ बनने वाले डॉक्टरों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे आवेदन पत्र भरते समय “पूरी तरह से सतर्क और सटीक” रहें।

हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता अन्यथा पात्र और उपयुक्त पाई जाती है, तो NEET-PG मेरिट सूची में उसके नाम पर विचार किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि केवल प्रायोजक की पासबुक अपलोड न करने के आधार पर उसके दावे को खारिज न किया जाए।

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प्रक्रियात्मक सावधानी के महत्व को रेखांकित करने के लिए, जज ने याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में 1 लाख रुपये दान करने की अनुमति दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह दान अनिवार्य है, चाहे उसे अंततः पीजी कोर्स में प्रवेश मिले या नहीं।

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