मुस्लिम व्यक्ति वारिसों की सहमति के बिना पूरी संपत्ति की वसीयत नहीं कर सकता, केवल एक-तिहाई हिस्सा देने का अधिकार: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को खारिज करते हुए मुस्लिम कानून (Mahomedan Law) के तहत वसीयत के अधिकारों पर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि एक मुस्लिम वसीयतकर्ता (Testator) अपने कानूनी वारिसों की सहमति के बिना अपनी संपत्ति का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत नहीं कर सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि वसीयत वास्तविक भी हो, तो भी वारिसों की मृत्यु के बाद की सहमति के बिना एक-तिहाई से अधिक की वसीयत प्रभावी नहीं हो सकती।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने एक विधवा द्वारा दायर दूसरी अपील (Second Appeal) को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। मामला पति द्वारा अपने भतीजे के पक्ष में की गई वसीयत की वैधता को चुनौती देने से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों ने वादी (विधवा) के दावे को पूरी तरह से खारिज करके गलती की, जबकि वह मृतक की निर्विवाद कानूनी वारिस थी। न्यायालय ने ‘मुस्लिम कानून के सिद्धांतों’ की धारा 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि कानूनी वारिसों की सहमति के बिना किया गया अतिरिक्त वसीयतनामा वैध नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, श्रीमती जैबुन निशा, स्वर्गीय अब्दुल सत्तार लोधिया की विधवा हैं, जिनका निधन 19 मई 2004 को हुआ था। विवादित संपत्ति कोरबा, छत्तीसगढ़ में स्थित एक भूमि और मकान है, जो मूल रूप से अब्दुल सत्तार के नाम पर दर्ज थी।

नवंबर 2007 में, अपीलकर्ता को पता चला कि राजस्व रिकॉर्ड में उनके साथ प्रतिवादी नंबर 1, मोहम्मद सिकंदर का नाम भी दर्ज कर लिया गया है। मोहम्मद सिकंदर, जो अब्दुल सत्तार के भाई गुलाम मुस्तफा का बेटा है, ने दावा किया कि वह मृतक का गोद लिया हुआ बेटा (Dattak Putra) है। विधवा ने इस प्रविष्टि को चुनौती दी और कहा कि उनके पति ने कभी भी उसे गोद नहीं लिया था और वह संपत्ति की एकमात्र मालिक हैं।

प्रतिवादी ने 27 अप्रैल 2004 को अब्दुल सत्तार द्वारा निष्पादित एक कथित वसीयत का सहारा लिया। ट्रायल कोर्ट ने 7 फरवरी 2015 को विधवा के दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद, प्रथम अपीलीय अदालत ने भी 28 जनवरी 2016 को इस फैसले को बरकरार रखा, यह मानते हुए कि वसीयत साबित हो चुकी है।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (वादी) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि:

  • दोनों पक्ष मुस्लिम कानून द्वारा शासित हैं, जिसमें ‘गोद लेने’ (Adoption) की अवधारणा को मान्यता प्राप्त नहीं है।
  • मुस्लिम कानून के तहत, किसी वारिस के पक्ष में की गई वसीयत तब तक मान्य नहीं होती जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद अन्य वारिस उस पर सहमति न दें।
  • एक मुस्लिम अपनी संपत्ति के एक-तिहाई से अधिक हिस्से की वसीयत वारिसों की सहमति के बिना नहीं कर सकता। कथित वसीयत में अपीलकर्ता की सहमति के बिना पूरी संपत्ति प्रतिवादी को देने की बात कही गई थी, जो अवैध है।
  • निचली अदालतों ने वसीयत को गलत साबित करने और सहमति न होने का सबूत देने का भार (Burden of Proof) गलत तरीके से अपीलकर्ता पर डाल दिया।
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प्रतिवादी (प्रतिवादी) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि:

  • वसीयत स्वेच्छा से निष्पादित की गई थी और स्वतंत्र गवाहों द्वारा इसे साबित किया गया है।
  • अपीलकर्ता ने निष्पादन के लिए सहमति दी थी और खुद नामांतरण (Mutation) के लिए वसीयत प्रतिवादी को सौंपी थी।
  • प्रतिवादी को मृतक द्वारा पुत्र की तरह माना जाता था, जिसका समर्थन बिलासपुर यंग मेमन एसोसिएशन के दस्तावेजों से होता है।
  • अपीलकर्ता की कई वर्षों तक चुप्पी सहमति का संकेत देती है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मामले के मुख्य मुद्दे पर विचार किया कि क्या मुस्लिम कानून के तहत एक निर्विवाद कानूनी वारिस को उसके अधिकारों से पूरी तरह वंचित किया जा सकता है।

1. वसीयत करने की शक्ति पर कानूनी सीमाएं: न्यायालय ने मुस्लिम कानून के सिद्धांतों की धारा 118 का उल्लेख किया, जो यह निर्धारित करती है कि एक मुस्लिम अपने अंतिम संस्कार और कर्ज के भुगतान के बाद बची हुई संपत्ति के एक-तिहाई से अधिक का वसीयत नहीं कर सकता। एक-तिहाई से अधिक की वसीयत तब तक प्रभावी नहीं हो सकती जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद वारिस उस पर सहमति न दें। इसके अलावा, धारा 117 के तहत, किसी वारिस के पक्ष में की गई वसीयत भी अन्य वारिसों की सहमति के बिना मान्य नहीं है।

2. सबूत का भार और सहमति: न्यायालय ने पाया कि निचली अदालतों ने सबूत का भार अपीलकर्ता पर डालकर कानून में गंभीर त्रुटि की है। पीठ ने कहा:

“चूंकि प्रतिवादी ने उस वसीयत का सहारा लिया था जिसमें पूरी संपत्ति देने की बात कही गई थी, इसलिए मुस्लिम कानून की धारा 117 और 118 के अनुपालन को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी उसी पर थी।”

सहमति के दावे पर न्यायालय ने स्पष्ट किया:

“केवल चुप्पी या कार्यवाही शुरू करने में देरी को अपने आप में सहमति का दर्जा नहीं दिया जा सकता, विशेष रूप से जब मुस्लिम कानून के तहत सहमति स्वतंत्र, सचेत और वारिसों द्वारा मृत्यु के बाद दी जानी चाहिए।”

फैसला

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम अपीलीय अदालत ने यह स्वीकार करने के बावजूद कि प्रतिवादी अधिक से अधिक एक-तिहाई संपत्ति का दावा कर सकता था, मुकदमे को पूरी तरह खारिज करके गंभीर कानूनी गलती की है।

न्यायालय ने कहा कि केवल इसलिए कि वादी ने पूर्ण स्वामित्व का दावा किया था, निचली अदालतें उसे उत्तराधिकार कानून से मिलने वाले उसके वैध हिस्से से वंचित नहीं कर सकती थीं। निचली अदालतों का दृष्टिकोण मुस्लिम कानून की धारा 117 और 118 के उद्देश्य को विफल करता है।

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नतीजतन, हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और ट्रायल कोर्ट व प्रथम अपीलीय अदालत के फैसलों को रद्द कर दिया।

केस विवरण

  • केस टाइटल: श्रीमती जैबुन निशा बनाम मोहम्मद सिकंदर व अन्य
  • केस नंबर: एस.ए. नंबर 195/2016
  • कोरम: जस्टिस बिभु दत्ता गुरु

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