जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा के हालिया सार्वजनिक बयानों को “सांप्रदायिक, विभाजनकारी और संविधान की मूल भावना के खिलाफ” बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह आवेदन जमीयत के एक लंबित मामले में दायर किया गया है, जिसमें शीर्ष अदालत ने 20 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
यह याचिका खासतौर पर 27 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए उस भाषण को लेकर है, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं।
जमीयत की ओर से संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद के माध्यम से दाखिल इस अर्जी में कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति उच्च संवैधानिक पद पर बैठा हो, तो उसके बयान को “राजनीतिक बयानबाजी” या “स्वतंत्र अभिव्यक्ति” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
याचिका में कहा गया है कि–
“ऐसे बयान समाज में नफरत और वैमनस्य फैलाने का एक सोचा-समझा प्रयास हैं, जो पूरे समुदाय को कलंकित करते हैं और सामाजिक सद्भाव को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाते हैं।”
जमीयत ने अदालत से अपील की है कि वह संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश तय करे ताकि कोई भी व्यक्ति अपने पद का दुरुपयोग कर किसी समुदाय के खिलाफ घृणा न फैला सके, सार्वजनिक शत्रुता न भड़का सके या किसी समूह को बदनाम न कर सके।
याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे बयान न केवल संविधान की बुनियादी मूल्यों– समानता, धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व और मानव गरिमा– को कमजोर करते हैं, बल्कि अनुच्छेद 19(1)(a) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आते।
जमीयत ने तर्क दिया है कि इस तरह की टिप्पणियां कानून के शासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना के खिलाफ हैं, और इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस पर हस्तक्षेप करते हुए दिशा-निर्देश तय करने चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर हो, संविधान से ऊपर न हो सके।

