शिक्षा विभाग में फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी पाने वालों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने न केवल 15 साल से नौकरी कर रही एक शिक्षिका की बर्खास्तगी को सही ठहराया, बल्कि फर्जीवाड़े के इस “खतरनाक पैटर्न” को देखते हुए पूरे उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की समयबद्ध जांच का आदेश भी दिया है।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने गरिमा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी से पाई गई नौकरी में ‘नेचुरल जस्टिस’ या सुनवाई के अवसर का तर्क मान्य नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
देवरिया जिले की यह घटना शिक्षा व्यवस्था में गहरे पैठ बना चुके भ्रष्टाचार की बानगी है। याची गरिमा सिंह की नियुक्ति 27 जुलाई 2010 को सहायक अध्यापक के पद पर उच्चतर प्राथमिक विद्यालय, बर्डीहा दलपत, विकास खंड-सलेमपुर में हुई थी। वह करीब 15 साल से वहां पढ़ा रही थीं।
अगस्त 2025 में बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA), देवरिया ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी। बीएसए का कहना था कि जांच में याची के दस्तावेज फर्जी पाए गए। इसके खिलाफ गरिमा सिंह ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि नियुक्ति के समय उनके दस्तावेजों की जांच हुई थी और पिछले 15 सालों में उनके खिलाफ कोई शिकायत नहीं थी।
अदालत में दलीलें
याची का पक्ष: याची के वकील का तर्क था कि 15 साल की सेवा के बाद दस्तावेजों की फिर से जांच करना और बिना सुनवाई का मौका दिए बर्खास्त करना गलत है। उन्होंने इसे ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ का उल्लंघन बताया।
सरकार और बीएसए का पक्ष: बीएसए के वकील आशीष कुमार नागवंशी ने कोर्ट को बताया कि यह कार्रवाई सक्षम अधिकारी और एसटीएफ (STF) की जांच के बाद की गई है। जांच में खुलासा हुआ कि गरिमा सिंह ने जिन शैक्षणिक प्रमाणपत्रों और निवास प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाई थी, वे फर्जी थे और असल में किसी और ‘गरिमा सिंह’ के थे।
विभाग ने बताया कि 2 जुलाई 2025 को नोटिस भेजा गया था, लेकिन शिक्षिका ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने दलील दी कि कानूनन “धोखाधड़ी से प्राप्त नियुक्ति के मामलों में विस्तृत जांच या सुनवाई के अवसर की आवश्यकता नहीं होती।”
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि जब धोखाधड़ी साबित हो चुकी हो, तो जांच की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कमलेश कुमार निरंकारी और कृष्ण कांत जैसे पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कपट करने वाला व्यक्ति नियमों का लाभ नहीं उठा सकता।
सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब कोर्ट ने अपना फैसला लिखवाना शुरू किया। इसे देखते हुए याची के वकील ने याचिका वापस लेने की मांग की ताकि वे अपील कर सकें, लेकिन कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“इस न्यायालय ने बार-बार एक चिंताजनक पैटर्न देखा है जहां बड़ी संख्या में सहायक अध्यापकों ने जाली प्रमाणपत्रों और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां हासिल की हैं। ऐसे लोग संस्थानों के प्रबंधन और कई मामलों में संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारियों की मिलीभगत या मूक सहमति से सालों तक सेवा में बने रहते हैं।”
पूरे राज्य में जांच का आदेश (Mandamus)
हाईकोर्ट ने न केवल गरिमा सिंह की याचिका खारिज कर दी, बल्कि जनहित और शिक्षा की शुचिता को बचाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। कोर्ट ने प्रमुख सचिव, बेसिक शिक्षा को ‘परमादेश’ (Mandamus) जारी करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- राज्यव्यापी जांच: पूरे प्रदेश में सहायक अध्यापकों की नियुक्तियों की व्यापक और समयबद्ध जांच (Time-bound scrutiny) की जाए।
- कड़ी कार्रवाई: जो भी शिक्षक फर्जीवाड़े के दोषी पाए जाएं, उनकी नियुक्ति रद्द कर वेतन की वसूली की जाए।
- अधिकारियों पर गाज: कोर्ट ने उन अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई करने को कहा है, जिनकी मिलीभगत या लापरवाही से ऐसे फर्जी शिक्षक नौकरी पा सके।
- समय सीमा: यह पूरी प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति तत्काल अनुपालन के लिए प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) और प्रमुख सचिव (विधि) को भेजी जाए।
केस का विवरण:
- केस टाइटल: गरिमा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
- केस नंबर: रिट – ए नंबर 19634 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान
- याची के वकील: राम बदन, तेज प्रकाश मिश्रा
- प्रतिवादी के वकील: आशीष कुमार (नागवंशी), सी.एस.सी.

