बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक प्रोबेशनरी सहायक शिक्षक (शिक्षण सेवक) की सेवा समाप्ति को बरकरार रखा है, जिसे अपनी छात्रा को व्हाट्सएप पर ‘अनुचित संदेश’ भेजने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था। जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि एक शिक्षक का ऐसा आचरण “असंतोषजनक व्यवहार” (Unsatisfactory Behaviour) की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में स्कूल प्रबंधन “जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी” अपनाने का हकदार है और इसके लिए पूर्ण विभागीय जांच (Departmental Enquiry) की आवश्यकता नहीं है, विशेषकर तब जब शिक्षक ने स्वयं अपनी गलती लिखित में स्वीकार की हो।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, गावित गुलाबसिंग सुका, को 29 फरवरी 2020 को न्यू इंग्लिश स्कूल एंड जूनियर कॉलेज, म्हसला में बतौर प्रोबेशनरी सहायक शिक्षक नियुक्त किया गया था। उनका तीन साल का प्रोबेशन (परिवीक्षा) 28 फरवरी 2023 को समाप्त होना था।
विवाद की शुरुआत 23 दिसंबर 2022 को हुई, जब स्कूल को एक छात्रा के माता-पिता से शिकायत मिली। शिकायत में आरोप लगाया गया कि शिक्षक छात्रा के साथ “इंस्टेंट मैसेजिंग” के जरिए संपर्क में हैं और संदेशों का यह आदान-प्रदान उत्पीड़न के समान है। उसी दिन, याचिकाकर्ता ने स्कूल के प्रिंसिपल को एक लिखित माफीनामा सौंपा और छात्रा के साथ इलेक्ट्रॉनिक संपर्क में रहने की बात स्वीकार की।
प्रिंसिपल ने 28 दिसंबर 2022 को प्रबंधन को एक रिपोर्ट सौंपी। फैसले में नोट किया गया कि इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर अशांति फैल गई थी और भीड़ जमा हो गई थी, जिसके कारण प्रिंसिपल को बीच-बचाव कर शिक्षक को बचाना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप, प्रबंधन ने 31 जनवरी 2023 को आदेश जारी कर 1 फरवरी 2023 से याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दीं और उन्हें नोटिस के बदले एक महीने का वेतन दिया।
स्कूल ट्रिब्यूनल द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद, शिक्षक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुगंध देशमुख ने मुख्य रूप से दो आधारों पर बर्खास्तगी को चुनौती दी:
- स्वाभाविक न्याय का उल्लंघन: उन्होंने तर्क दिया कि बर्खास्तगी से पहले न तो कोई उचित जांच की गई और न ही कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिससे उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिला।
- डीम्ड परमानेंसी (स्वतः स्थायीकरण): उन्होंने दलील दी कि कानून के संचालन से नोटिस अवधि समाप्त होने से पहले ही वे एक स्थायी कर्मचारी बन गए थे, इसलिए एक स्थायी शिक्षक को हटाने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।
प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र वी. बांदीवाडेकर ने बर्खास्तगी का बचाव करते हुए याचिकाकर्ता के लिखित माफीनामे और प्रोबेशनर्स को नियंत्रित करने वाले वैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
जस्टिस सुंदरेशन ने ‘महाराष्ट्र निजी स्कूल कर्मचारी (सेवा की शर्तें) विनियमन अधिनियम, 1977’ (MEPS Act) की धारा 5(3) का विश्लेषण किया। यह धारा प्रबंधन को अधिकार देती है कि यदि प्रोबेशनरी कर्मचारी का काम या व्यवहार “संतोषजनक नहीं” है, तो उसे एक महीने के नोटिस या वेतन के साथ सेवा से हटाया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि प्रबंधन की राय “वस्तुनिष्ठ और तर्कपूर्ण” होनी चाहिए। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में सेवा समाप्ति का आधार कक्षा में पढ़ाने का प्रदर्शन नहीं, बल्कि “कक्षा के बाहर का व्यवहार” था।
‘असंतोषजनक व्यवहार’ और ‘जीरो-टॉलरेंस’
आरोपों की गंभीरता पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि मामला “30 साल के एक शिक्षक द्वारा छात्रा के साथ व्हाट्सएप पर रोमांटिक संदेशों के आदान-प्रदान” से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने अपनी गलती के लिए लिखित माफी मांगी थी और उसे वापस नहीं लिया था। कोर्ट ने कहा:
“इस पृष्ठभूमि में, मेरी राय में, प्रबंधन इस मामले के विशिष्ट तथ्यों को देखते हुए जीरो-टॉलरेंस पॉलिसी अपनाने और भविष्य के संकट से बचने का हकदार है। याचिकाकर्ता प्रोबेशन पर था और वैधानिक रूप से प्रबंधन को एक महीने के नोटिस या वेतन के साथ प्रोबेशन समाप्त करने का अधिकार था।”
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रबंधन के पास यह मानने के लिए पर्याप्त सामग्री थी कि “स्कूल शिक्षक के लिए अशोभनीय आचरण संतोषजनक व्यवहार नहीं है।”
जांच की आवश्यकता पर
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह मामला केवल आरोपों पर आधारित नहीं था बल्कि शिक्षक ने संपर्क की बात स्वीकार की थी, इसलिए विस्तृत विभागीय जांच की आवश्यकता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला उन मामलों से अलग है जहां आरोप अस्पष्ट या व्यक्तिपरक (जैसे मानसिक अस्थिरता) होते हैं और उन्हें साबित करने की आवश्यकता होती है।
फैसला
हाईकोर्ट ने शिक्षक की याचिका को खारिज कर दिया और स्कूल ट्रिब्यूनल के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि स्वीकृत तथ्यों के आधार पर प्रबंधन का यह वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन सही था कि प्रोबेशनरी शिक्षक का व्यवहार संतोषजनक नहीं था, जो बिना किसी पूर्ण विभागीय जांच के बर्खास्तगी को सही ठहराता है।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: श्री गावित गुलाबसिंग सुका बनाम श्री स्वामी विवेकानंद शिक्षण संस्था (कोल्हापुर) और अन्य
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 16771 ऑफ 2024
- कोरम: जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री सुगंध देशमुख साथ में अनिकेत कानावडे, भूषण जी. देशमुख, वैभव थोरावे, आर्यन देशमुख, इरविन डिसूजा और करिश्मा शिंदे
- प्रतिवादियों के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नरेंद्र वी. बांदीवाडेकर साथ में विनायक आर. कुंभार, राजेंद्र खैरे और अनिकेत फपाले; श्रीमती एम. एस. श्रीवास्तव (एजीपी)

