सुप्रीम कोर्ट: संविदा की शर्तें संवैधानिक अधिकारों पर हावी नहीं हो सकतीं; झारखंड के जूनियर इंजीनियर्स को नियमित करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि नियमितीकरण (Regularization) के दावों को रोकने वाली संविदा (Contractual) की शर्तें संवैधानिक गारंटी से ऊपर नहीं हो सकती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य एक “आदर्श नियोक्ता” (Model Employer) होने के नाते केवल संविदा के लेबल का सहारा लेकर लंबे समय से सेवारत कर्मचारियों को निष्पक्षता और गरिमा के विपरीत तरीके से सेवा से नहीं हटा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के उन फैसलों को खारिज कर दिया, जिनमें संविदा के आधार पर नियुक्त जूनियर इंजीनियर्स (कृषि) की सेवाओं को नियमित करने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने झारखंड राज्य को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को उन स्वीकृत पदों पर “तत्काल नियमित” करे जिन पर उन्हें शुरू में नियुक्त किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सितंबर 2012 में भूमि संरक्षण निदेशालय (Land Conservation Directorate) में जूनियर इंजीनियर (कृषि) के 22 स्वीकृत पदों के लिए जारी विज्ञापन के तहत हुई थी। नियुक्ति पत्रों में यह शर्त थी कि यह नियुक्ति अस्थायी और संविदा के आधार पर है, जिसे संतोषजनक प्रदर्शन के आधार पर बढ़ाया जा सकता है। शर्तों में यह भी कहा गया था कि राज्य सरकार इन नियुक्तियों को नियमित करने के लिए बाध्य नहीं होगी।

याचिकाकर्ता समय-समय पर मिले सेवा विस्तार (Extensions) के माध्यम से एक दशक से अधिक समय तक सेवा में बने रहे। वर्ष 2015 में, मृदा संरक्षण निदेशक ने राज्य सरकार को एक अभ्यावेदन भेजा था, जिसमें इनके नियमितीकरण के लिए नियम बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि, फरवरी 2023 में याचिकाकर्ताओं को सेवा विस्तार दिया गया, जिसे उन्होंने अंतिम विस्तार माना और इसके खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

उन्होंने नियमितीकरण के लिए ‘ परमादेश रिट’ (Writ of Mandamus) की मांग की। झारखंड हाईकोर्ट की एकल पीठ (Single Judge) ने 14 मई, 2024 को उनकी रिट याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनकी नियुक्ति की प्रकृति संविदात्मक थी, इसलिए उनके पास नवीनीकरण या नियमितीकरण का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके बाद, खंडपीठ (Division Bench) ने भी उनकी अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि न्यायिक निर्देश द्विपक्षीय अनुबंध (Bilateral Contract) की शर्तों को नहीं बदल सकते।

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को रोस्टर क्लीयरेंस सहित एक उचित चयन प्रक्रिया के बाद खाली और स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने बिना किसी रुकावट या प्रतिकूल रिकॉर्ड के 10 से अधिक वर्षों तक निरंतर सेवा की है।

श्री परमेश्वर ने तर्क दिया कि नियुक्ति पत्रों में नियमितीकरण को रोकने वाली शर्त सार्वजनिक नीति के विपरीत है और भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 23 के तहत शून्य है, क्योंकि याचिकाकर्ता बेरोजगार थे और उनके पास राज्य के समान सौदेबाजी की शक्ति (Bargaining Power) नहीं थी। उन्होंने नियमितीकरण के लिए संविधान पीठ के कर्नाटक राज्य बनाम उमा देवी (2006) के फैसले का हवाला दिया और जोर दिया कि राज्य का इनकार संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

इसके विपरीत, झारखंड राज्य के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने नियमितीकरण पर रोक सहित सभी शर्तों की पूरी जानकारी के साथ अनुबंध किया था। यह दलील दी गई कि चूंकि नियुक्ति पूरी तरह से संविदात्मक थी, इसलिए किसी विशिष्ट योजना के अभाव में याचिकाकर्ताओं को सेवा में बने रहने या नियमितीकरण मांगने का कोई अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मुद्दों पर विचार किए बिना केवल पुरानी नजीरों (Precedents) का यंत्रिक रूप से पालन करने के लिए हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर असहमति जताई। पीठ ने जोर देकर कहा कि राज्य एक “आदर्श नियोक्ता” है और वह अपने कर्मचारियों की कमजोरी या असमान सौदेबाजी की स्थिति का फायदा नहीं उठा सकता।

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1. असमान सौदेबाजी की शक्ति: “शेर और मेमने” का उदाहरण: राज्य और एक व्यक्तिगत नौकरी चाहने वाले के बीच की असमानता का जिक्र करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस तरह के रिश्ते में राज्य एक प्रतीकात्मक शेर की भूमिका में होता है, जिसके पास अपार अधिकार, संसाधन और सौदेबाजी की ताकत होती है, जबकि कर्मचारी, जो अभी एक अभ्यर्थी है, एक प्रतीकात्मक मेमने की स्थिति में होता है, जिसके पास वास्तविक बातचीत की शक्ति बहुत कम होती है।”

कोर्ट ने कहा कि इस तरह की संरचनात्मक असमानता में, संवैधानिक अदालतों को कमजोर पक्ष की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। सेंट्रल इनलैंड वॉटर ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम ब्रोजो नाथ गांगुली (1986) और पानी राम बनाम भारत संघ (2021) का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि अदालतें असमान सौदेबाजी की शक्ति वाले पक्षों के बीच किए गए अनुचित या अनुचित अनुबंधों को लागू नहीं करेंगी।

2. मौलिक अधिकारों का त्याग नहीं: बशेश्वर नाथ बनाम आयकर आयुक्त (1958) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों का त्याग (Waiver) नहीं किया जा सकता है। इसलिए, केवल यह तथ्य कि नियुक्ति संविदात्मक शर्तों द्वारा शासित थी, मनमानी राज्य कार्रवाई के खिलाफ अनुच्छेद 14 के तहत याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का त्याग नहीं माना जा सकता।

3. वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation): कोर्ट ने इस मामले को उमा देवी केस की सीमाओं से अलग किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘वैध अपेक्षा’ के सिद्धांत पर रोक उन नियुक्तियों पर लागू होती है जो उचित चयन प्रक्रिया के बिना की गई हों। चूंकि याचिकाकर्ताओं को उचित चयन प्रक्रिया का पालन करते हुए स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया था, इसलिए कोर्ट ने माना कि वे इस सिद्धांत का सहारा ले सकते हैं।

कोर्ट ने कहा, “नियोक्ता-राज्य द्वारा उनके प्रदर्शन में विश्वास व्यक्त करना और लगातार मौद्रिक उन्नयन और कार्यकाल विस्तार देना, उचित रूप से यह उम्मीद जगाता है कि उनकी लंबी और निरंतर सेवा को आगे मान्यता मिलेगी।”

4. मनमानापन और तदर्थवाद (Ad-hocism): पीठ ने लगभग दस वर्षों के बाद याचिकाकर्ताओं की सेवा समाप्त करने के राज्य के निर्णय को “प्रत्यक्ष रूप से मनमाना” करार दिया। कोर्ट ने धर्म सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) का हवाला देते हुए “तदर्थवाद” (Ad-hocism) की संस्कृति और नियमित रोजगार दायित्वों से बचने के लिए कर्मचारियों को केवल नाममात्र के लेबल के तहत रखने की प्रथा की आलोचना की।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. संविदात्मक बचाव खारिज: कोर्ट ने कहा कि संविदात्मक शर्तें राज्य की मनमानी कार्रवाई को संवैधानिक जांच से नहीं बचा सकतीं।
  2. नियमितीकरण का आदेश: प्रतिवादी-राज्य को निर्देश दिया गया कि वह “सभी याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को उन स्वीकृत पदों पर तत्काल नियमित करे जिन पर उन्हें शुरू में नियुक्त किया गया था।”
  3. लाभ: याचिकाकर्ताओं को इस फैसले की तारीख से सभी परिणामी सेवा लाभ (Consequential Service Benefits) का हकदार माना गया।
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कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य लंबे समय तक तदर्थवाद (Ad-hocism) को सही ठहराने के लिए संविदात्मक लेबल या उमा देवी मामले के यांत्रिक अनुप्रयोग का सहारा नहीं ले सकता।

केस डिटेल्स

  • केस का नाम: भोला नाथ बनाम झारखंड राज्य और अन्य (तथा अन्य संबद्ध अपीलें)
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 30762, 2024 से उद्भूत)
  • कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

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