सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिकाओं में प्रमुख याचिका गैर-सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) द्वारा दाखिल की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सभी पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण ने पक्ष रखा। वहीं चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी और मनींदर सिंह ने दलीलें दीं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई जवाबी दलीलों में कहा गया कि चुनाव आयोग द्वारा की गई विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में मतदाताओं के नामों की गलत तरीके से कटौती या शामिल किए जाने की आशंका है, जिससे वंचित तबकों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आयोग किस आधार पर नागरिकता की पुष्टि कर रहा है।
कोर्ट ने 12 अगस्त 2025 को इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की थी। उस दौरान न्यायालय ने कहा था कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के तहत चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है।
चुनाव आयोग ने पुनरीक्षण प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, और इन दस्तावेजों के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अब शीर्ष अदालत के निर्णय का इंतजार है, जो बिहार में ही नहीं, बल्कि देशभर में मतदाता सूची के संचालन और पहचान दस्तावेजों की वैधता को लेकर अहम दिशा तय कर सकता है।

