सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर से चिकित्सकीय जांच का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की चिकित्सकीय स्थिति पर संज्ञान लेते हुए उन्हें विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि वांगचुक की शिकायत को देखते हुए गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ से जांच कराई जाए और मेडिकल रिपोर्ट सोमवार तक सीलबंद लिफाफे में सौंपी जाए।

यह आदेश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले की पीठ ने तब पारित किया जब वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तत्काल चिकित्सकीय जांच की मांग को लेकर याचिका का उल्लेख किया।

सिब्बल ने अदालत से कहा, “उन्हें पानी की वजह से पेट में परेशानी हो रही है। वह काफी समय से डॉक्टर से जांच की मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई डॉक्टर नहीं आता। कृपया उन्हें हफ्ते में एक बार जांच की सुविधा दी जाए और उन्हें हम जो पानी देते हैं, वही पीने दिया जाए।”

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राजस्थान सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि वांगचुक को पिछले चार महीनों में 21 बार जेल के डॉक्टर ने जांचा है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने अदालत में उनकी मेडिकल रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि 26 सितंबर से 26 जनवरी के बीच उन्हें कई बार देखा गया है और हालिया रिपोर्ट में उनका ब्लड प्रेशर और अन्य जांच सामान्य पाई गई है। उन्हें विटामिन B12 लेने की सलाह दी गई है।

हालांकि शीर्ष अदालत ने कहा कि जेल के सामान्य डॉक्टर की रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है और किसी विशेषज्ञ से जांच जरूरी है। अदालत ने राज्य सरकार के वकील के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें कहा गया कि वांगचुक की एक सरकारी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराई जाएगी और उसकी रिपोर्ट सोमवार तक सीलबंद लिफाफे में दी जाएगी।

उल्लेखनीय है कि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था। इससे दो दिन पहले लद्दाख में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जे की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों में चार लोगों की मौत हो गई थी और 90 लोग घायल हुए थे। सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है।

NSA के तहत केंद्र और राज्य सरकारें किसी व्यक्ति को भारत की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा मानते हुए अधिकतम 12 महीने तक निरोधात्मक हिरासत में ले सकती हैं, हालांकि यह अवधि पहले भी समाप्त की जा सकती है।

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अब शीर्ष अदालत वांगचुक की विशेषज्ञ जांच की रिपोर्ट मिलने के बाद इस मुद्दे पर आगे विचार करेगी।

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