सुप्रीम कोर्ट: अधिकारियों की गलती या चूक के कारण राज्य के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए; सार्वजनिक भूमि मामले में देरी को किया माफ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि “अधिकारियों के किसी कृत्य या चूक (omission/commission) के कारण राज्य के हितों को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।” इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें मदुरै के जिला कलेक्टर द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका (Review Petition) में हुई भारी देरी को माफ कर दिया गया था।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि जब मामला राज्य की भूमि और सार्वजनिक हित से जुड़ा हो, तो अदालत को देरी को माफ करने के संबंध में एक “व्यावहारिक दृष्टिकोण” (pragmatic view) अपनाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विनोद गांधी बनाम जिला कलेक्टर, मदुरै और अन्य (SLP (C) No. 4337/2025) से संबंधित है। विवाद उस भूमि को लेकर था, जिसके बारे में याचिकाकर्ता का दावा था कि इसे वर्ष 1950 में उनके विक्रेता (Vendor) के पूर्ववर्ती (predecessor-in-interest) के पक्ष में सेटल किया गया था।

याचिकाकर्ता के अनुसार, 2008 में पट्टा देने से इनकार कर दिया गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गई और कोर्ट ने पट्टा जारी करने का निर्देश दिया। इसके बाद, याचिकाकर्ता के विक्रेता के पूर्ववर्ती ने स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) के लिए एक मुकदमा दायर किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ दायर पहली और दूसरी अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। दूसरी अपील (S.A. (MD) No. 417 of 2006) का निस्तारण 24 अगस्त 2007 को किया गया था।

प्रतिवादी (जिला कलेक्टर) ने 2007 के आदेश के खिलाफ एक पुनर्विचार याचिका दायर की। इसके बाद 31 अगस्त 2012 को देरी को माफ करने के आवेदन के साथ एक नई पुनर्विचार याचिका दायर की गई। मद्रास हाईकोर्ट ने 24 जनवरी 2025 के आक्षेपित आदेश के माध्यम से देरी को माफ कर दिया, जिसे याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का आदेश “बिना किसी विवेक का प्रयोग किए” पारित किया गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में लगभग 17 वर्षों की “अत्यधिक और स्पष्टीकरण रहित देरी” हुई है।

श्री दीवान ने निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए:

  • तीन न्यायालयों के समवर्ती निष्कर्ष (Concurrent findings) याचिकाकर्ता/उनके पूर्ववर्तियों के पक्ष में हैं।
  • तीसरे पक्ष के अधिकार (Third-party rights) सृजित हो चुके हैं और किसी भी निजी व्यक्ति की ओर से कोई आपत्ति नहीं थी।
  • राज्य के पास 1950 के मूल सेटलमेंट के संबंध में कोई रिकॉर्ड नहीं है।
  • पुनर्विचार याचिका में याचिकाकर्ता को पक्षकार नहीं बनाया गया था, जिससे उन्हें देरी की माफी का विरोध करने का अवसर नहीं मिला और उनके अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

प्रतिवादी-राज्य के वकील ने दलील दी कि राज्य के रिकॉर्ड में यह भूमि कभी भी 1950 में मूल व्यक्ति के पक्ष में सेटल नहीं की गई थी, क्योंकि कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। राज्य ने तर्क दिया कि यह “सरकारी भूमि है, और वह भी एक जल निकाय (water body)” है। इसलिए, राज्य और जनता के व्यापक हित में यह आवश्यक है कि इस मुद्दे को अंतिम रूप से सुलझाया जाए। राज्य ने यह भी कहा कि तत्कालीन कलेक्टर द्वारा मामले को ठीक से नहीं संभाला गया था और यह समय पर संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में नहीं आया।

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को स्वीकार किया कि देरी “अत्यधिक और स्पष्टीकरण रहित” है। हालांकि, पीठ ने जोर देकर कहा कि देरी को संबंधित वाद (lis) पर पड़ने वाले परिणामों के साथ तौला जाना चाहिए।

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कोर्ट ने कहा:

“हमारा मानना ​​है कि देरी और उसकी माफी एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत अधिक स्पष्टीकरण या औचित्य की आवश्यकता नहीं है, यह देखते हुए कि घटनाओं के क्रम के संबंध में तारीखें विवादित नहीं हैं। अदालत को केवल एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना है कि क्या मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में और संबंधित वाद पर इसके अंतिम परिणामों को देखते हुए, ऐसी माफी आवश्यक है।”

राज्य की मुकदमेबाजी के सिद्धांत को दोहराते हुए, कोर्ट ने कहा:

“इसके अलावा, यह स्थापित कानून (trite law) है कि अपने अधिकारियों के कृत्य या चूक (omission/commission) के लिए राज्य के हित को नुकसान नहीं उठाना चाहिए।”

पीठ ने जिला कलेक्टर के इस स्पष्ट रुख पर गौर किया कि मामले को पहले ठीक से नहीं संभाला गया था और यह अधिकारियों के संज्ञान में नहीं आया था।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने घटनाओं के सूक्ष्म विवरण में जाने से इनकार कर दिया और मामले में एक “समग्र दृष्टिकोण” (holistic view) अपनाया। कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा देरी को माफ करने के आदेश में हस्तक्षेप किए बिना विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निस्तारण कर दिया।

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हालांकि, याचिकाकर्ता के अधिकारों की रक्षा के लिए, कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. पक्षकार बनाना: याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के समक्ष लंबित पुनर्विचार याचिका में एक पक्षकार (party) बनाया जाएगा।
  2. गुण-दोष पर सुनवाई: हाईकोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता को गुण-दोष (merits) के आधार पर सुना जाएगा।
  3. समय सीमा: मामला पुराना होने के कारण, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह आज से छह महीने के भीतर सुनवाई पूरी करे।

रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह इस आदेश को मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सूचित करे ताकि इसे उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके।

केस डिटेल्स

  • केस टाइटल: विनोद गांधी बनाम जिला कलेक्टर, मदुरै और अन्य
  • केस नंबर: SLP (C) No. 4337/2025
  • कोरम: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन

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