छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग (अराजपत्रित) सेवा भर्ती नियम, 2016 में किए गए संशोधन की वैधता को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए यदि सरकार पदोन्नति नियमों में संशोधन कर कार्यभारित (work-charged) कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए पात्र बनाती है, तो इस कार्रवाई को मनमाना या अनुचित नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने नियमित कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि केवल पदोन्नति के अवसरों में कमी आना संविधान के अनुच्छेद 14 या 16 का उल्लंघन नहीं है।
मामला क्या था?
यह मामला बाशिल मिंज और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता लोक निर्माण विभाग (PWD) में ट्रेसर और सहायक ड्राफ्ट्समैन के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने 22 जनवरी, 2022 की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसके द्वारा विभाग ने 2016 के भर्ती नियमों की अनुसूची-IV में संशोधन किया था।
इस संशोधन के माध्यम से “डिप्लोमा धारक/डिग्री धारक कार्यभारित स्थापना के फील्ड असिस्टेंट” को उप-अभियंता (सिविल) के पद पर पदोन्नति के लिए पात्र बना दिया गया। इसके बाद, विभाग के प्रमुख अभियंता ने 14 जुलाई 2023 और 29 अगस्त 2023 को आदेश जारी कर कार्यभारित स्थापना के तहत काम करने वाले फील्ड असिस्टेंट्स को उप-अभियंता के पद पर पदोन्नत कर दिया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि कार्यभारित और आकस्मिकता निधि (contingency-paid) से वेतन पाने वाले कर्मचारी नियमित सरकारी सेवक नहीं हैं। उन्हें पदोन्नति के लिए नियमित कर्मचारियों के बराबर मानना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2003 के नियम 2(d) का हवाला देते हुए कहा कि कार्यभारित कर्मचारियों को पदोन्नति के लिए पात्र संवर्ग से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। उनका कहना था कि निजी प्रतिवादी कभी नियमित नहीं हुए और उन्होंने पांच साल की नियमित सेवा की शर्त पूरी नहीं की है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह याचिका विलंब और लचेस (delay and laches) से बाधित है, क्योंकि संशोधन जनवरी 2022 में हुआ था और याचिका अक्टूबर 2024 में दायर की गई। राज्य ने कहा कि प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर सेवा नियमों को बनाने या संशोधित करने का विशेष अधिकार सरकार के पास है। यह संशोधन उन पात्र कार्यभारित कर्मचारियों के बीच ठहराव (stagnation) को दूर करने के लिए किया गया था जिनके पास आवश्यक तकनीकी योग्यताएं थीं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद संशोधन की संवैधानिक वैधता और पदोन्नति के अधिकार पर विस्तार से चर्चा की।
विधायी क्षमता और अनुच्छेद 309: खंडपीठ ने पाया कि विवादित संशोधन संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जो प्राधिकारी सेवा नियम बनाने में सक्षम है, वह उनमें संशोधन करने के लिए भी उतना ही सक्षम है। जजों ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“यदि सरकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए पदोन्नति नियमों में संशोधन करके सार्वजनिक सेवा की दक्षता में सुधार के लिए कोई कदम उठाती है, तो ऐसी कार्रवाई को मनमाना या अनुचित नहीं ठहराया जा सकता।”
विलंब के आधार पर: कोर्ट ने माना कि याचिका दायर करने में अत्यधिक देरी हुई है। याचिकाकर्ताओं ने संशोधन के ढाई साल से अधिक समय बाद और पदोन्नति आदेश जारी होने के एक साल बाद चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पदोन्नति से संबंधित बासी दावों (stale claims) पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।
पदोन्नति का अधिकार: याचिकाकर्ताओं की इस दलील पर कि उनके पदोन्नति के अवसर कम हो गए हैं, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी का पदोन्नति पर कोई निहित अधिकार (vested right) नहीं होता है। कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम चंद्रकांत अनंत कुलकर्णी मामले का हवाला देते हुए कहा:
“पदोन्नति के केवल अवसर सेवा की शर्तें नहीं हैं और नियमों में संशोधन करके इन्हें बदला जा सकता है।”
समानता और वर्गीकरण: कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि नियमित और कार्यभारित कर्मचारियों के बीच असमानता है। कोर्ट ने कहा कि संशोधन द्वारा किया गया वर्गीकरण केवल स्थापना की प्रकृति पर नहीं, बल्कि शैक्षिक योग्यता और अनुभव पर आधारित है। कोर्ट ने कहा:
“पदोन्नति के लिए पात्र के रूप में कार्यभारित कर्मचारियों को शामिल करना एक सुधारात्मक उपाय है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी योग्य कर्मचारियों को करियर में आगे बढ़ने का अवसर मिले, बशर्ते वे पात्रता मानदंडों को पूरा करते हों।”
अंत में, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह संशोधन एक नीतिगत निर्णय था जो तर्कसंगत वर्गीकरण पर आधारित था और इसमें कोई असंवैधानिकता नहीं थी। तदनुसार, याचिका को गुण-दोष और विलंब दोनों आधारों पर खारिज कर दिया गया।
केस विवरण:
केस टाइटल: बाशिल मिंज और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
केस नंबर: डब्ल्यूपीएस (WPS) नंबर 6899 ऑफ 2024
पीठ: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल

