इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड (L&T) के शीर्ष प्रबंधन के खिलाफ विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया है। यह आदेश उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) द्वारा दायर एक आपराधिक शिकायत पर जारी किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट ने न्यायिक विवेक (Judicial Mind) का प्रयोग नहीं किया और तथ्यात्मक रूप से गलत आधार पर कार्यवाही की कि कंपनी बिना पूर्व सहमति के प्लांट संचालित कर रही थी, जबकि रिकॉर्ड पर एक वैध सहमति आदेश मौजूद था।
न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की एकल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए 19 फरवरी, 2022 के समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट ने आवेदकों- जिनमें L&T के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (CMD) और स्वतंत्र निदेशक शामिल हैं- को इस आधार पर तलब किया था कि उन्होंने बोर्ड से पूर्व अनुमोदन प्राप्त नहीं किया था। हालांकि, रिकॉर्ड से यह स्पष्ट था कि बोर्ड द्वारा पहले ही संचालन की वैध सहमति (Consent to Operate) जारी की जा चुकी थी। नतीजतन, हाईकोर्ट ने समन आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से निर्णय लेने के लिए मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL) के लिए L&T द्वारा शुरू की गई एक निर्माण परियोजना से उत्पन्न हुआ। L&T को ईस्टर्न डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के खुर्जा-पिलखनी खंड के लिए सिविल, संरचनाओं और ट्रैक कार्यों के डिजाइन और निर्माण का ठेका दिया गया था। कार्य को अंजाम देने के लिए, L&T ने गाजियाबाद के सैदपुर हुसैनपुर गांव में एक कंक्रीट बैचिंग प्लांट स्थापित किया।
यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) का दावा था कि उसके अधिकारियों ने 14 दिसंबर, 2020 को संयंत्र का निरीक्षण किया। निरीक्षण रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि औद्योगिक संयंत्र बिना पूर्व सहमति प्राप्त किए स्थापित किया गया था, जो वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 की धारा 21 का उल्लंघन है। इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि धूल के कण खुले में पाए गए और लोडिंग-अनलोडिंग के दौरान धूल को बैठने के लिए पानी के छिड़काव (Sprinklers) की व्यवस्था नहीं थी, जो धारा 37 के तहत दंडनीय सहमति शर्तों का उल्लंघन था।
इन आरोपों के आधार पर, UPPCB ने एक शिकायत (वाद संख्या 7217/2020) दर्ज की, और विद्वान विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रदूषण/सीबीआई), लखनऊ ने 19 फरवरी, 2022 को आवेदकों को समन जारी किया।
पक्षों की दलीलें
आवेदकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री दिलीप कुमार ने तर्क दिया कि शिकायत और उसके बाद जारी समन आदेश का आधार ही त्रुटिपूर्ण था। उन्होंने कहा कि L&T ने 1 दिसंबर, 2018 को ‘स्थापना की सहमति’ (Consent to Establish) और बाद में 21 अगस्त, 2020 को वायु अधिनियम के तहत ‘संचालन की सहमति’ (Consent to Operate) प्राप्त की थी, जो 1 अगस्त, 2020 से 31 जुलाई, 2022 तक वैध थी।
श्री कुमार ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट का आदेश दिमाग के प्रयोग की कमी को दर्शाता है, क्योंकि यह इस दावे पर आधारित था कि इकाई “बिना पूर्व सहमति प्राप्त किए” संचालित हो रही थी, जो कि बोर्ड के अपने दस्तावेजों द्वारा सीधे तौर पर गलत साबित होता है। आवेदकों ने यह भी तर्क दिया कि निरीक्षण के समय उन्हें निरीक्षण रिपोर्ट कभी नहीं सौंपी गई थी।
यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वकील श्री एस.एस. राजावत ने आवेदन का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि निरीक्षण में सहमति की शर्तों का उल्लंघन पाया गया, विशेष रूप से धूल के कणों को ढकने और पानी के छिड़काव को स्थापित करने में विफलता। उन्होंने कहा कि वायु अधिनियम की धारा 21 के तहत, सहमति की शर्तों का पालन करना अनिवार्य है, और मजिस्ट्रेट ने प्रक्रिया जारी करते समय निरीक्षण रिपोर्ट पर विचार किया था। उन्होंने डिप्टी चीफ कंट्रोलर ऑफ इंपोर्ट्स एंड एक्सपोर्ट्स बनाम रोशनलाल अग्रवाल (2003) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि प्रक्रिया जारी करने के चरण में विस्तृत आदेश की आवश्यकता नहीं है।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने समन आदेश और 21 अगस्त, 2020 के सहमति पत्र की जांच की। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने नोट किया कि मजिस्ट्रेट ने आक्षेपित आदेश में यह अवलोकन किया था:
“उक्त प्रपत्रों के अवलोकन से यह दर्शित है कि परिवादी द्वारा विपक्षी सं०-01 लगायत 21 द्वारा परिवादी बोर्ड की पूर्व सहमति प्राप्त किए बिना उद्योग का संचालन किया गया। अतः प्रथम दृष्टया धारा-21 वायु अधिनियम के आज्ञापक प्रावधानों का उल्लंघन विपक्षी सं०-01 लगायत 21 द्वारा किया जाना दर्शित है…”
हाईकोर्ट ने इस अवलोकन को तथ्यात्मक रूप से गलत पाया। कोर्ट ने कहा:
“उपरोक्त विचार से यह संकेत मिलता है कि विद्वान मजिस्ट्रेट ने गलत तथ्य नोट किया है, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया है कि आवेदकों द्वारा बिना पूर्व अनुमोदन/सहमति के यूनिट चलाई जा रही है। 21.08.2020 के पत्र के अवलोकन मात्र से यह तथ्य पूरी तरह से गलत साबित होता है।”
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा राय का गठन उचित विवेक के प्रयोग पर आधारित होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुनील भारती मित्तल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (AIR 2015 SC 923) पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने दोहराया:
“आदेश को रद्द किया जा सकता है यदि निष्कर्ष पर आते समय इसमें कोई कारण नहीं दिया गया है कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला है… और तो और, यदि दिया गया कारण स्पष्ट रूप से (ex facie) गलत निकलता है तो आदेश कानूनन खराब होगा।”
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मजिस्ट्रेट द्वारा उल्लेखित एकमात्र आधार- कि इकाई बिना पूर्व सहमति के चल रही थी- रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों के आलोक में टिकाऊ नहीं था।
निर्णय
हाईकोर्ट ने आवेदन को स्वीकार कर लिया और आपराधिक शिकायत संख्या 7217/2020 में पारित 19 फरवरी, 2022 के आक्षेपित समन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले को संबंधित मजिस्ट्रेट के पास वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि वे तथ्यों और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों पर अपना न्यायिक विवेक लागू करने के बाद शीघ्रता से नया निर्णय लें।
केस का विवरण:
- केस टाइटल: सुधींद्र वी. देसाई और 5 अन्य बनाम यू.पी. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, इसके सहायक पर्यावरण अभियंता श्री आशुतोष पांडे के माध्यम से
- केस नंबर: एप्लीकेशन यू/एस 482 नंबर 221 ऑफ 2026
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
- आवेदकों के वकील: श्री दिलीप कुमार (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री शिवंशु गोस्वामी, श्री रघुवंश मिश्रा, श्री सुभाष गुलाटी, श्री सुधांशु कुमार
- विपक्षी के वकील: श्री एस.एस. राजावत, श्री अशोक कुमार वर्मा

