बच्चों की कस्टडी और अभिभावकता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पिता अपनी पहली पत्नी से तलाक लिए बिना दूसरी महिला के साथ पत्नी की तरह रहता है, तो यह कृत्य “दुराचरण” और “क्रूरता” की श्रेणी में आता है। ऐसे में वह अपने नाबालिग बच्चे की कस्टडी का हकदार नहीं हो सकता। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने कहा कि बच्चे का कल्याण (Welfare of the minor) ही सर्वोपरि है, जिसे केवल पिता की बेहतर आर्थिक स्थिति के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट एक पिता द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसने फैमिली कोर्ट द्वारा अपने 7 वर्षीय बेटे की कस्टडी देने से इनकार करने के फैसले को चुनौती दी थी। कानूनी प्रश्न यह था कि क्या ‘हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956’ की धारा 6 के तहत स्वाभाविक अभिभावक (Natural Guardian) होने के बावजूद, पिता को इस आधार पर कस्टडी से वंचित किया जा सकता है कि वह बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रह रहा है।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि भले ही पिता स्वाभाविक अभिभावक है, लेकिन उसका यह अधिकार निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। कोर्ट ने माना कि जब सगी मां बच्चे को अच्छा माहौल दे रही हो, तब उसे सौतेली मां के भरोसे अनिश्चित माहौल में भेजना बच्चे के हित में नहीं होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला लक्ष्मीकांत जोशी बनाम लोकेश्वरी उर्फ परमेश्वरी के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। अपीलार्थी (पति) और प्रत्यर्थी (पत्नी) का विवाह 13 मई 2013 को हुआ था और उनके दो बेटे हैं। निर्णय के अनुसार:
- विवाद: वैवाहिक कलह के चलते पत्नी 6 अक्टूबर 2021 को अपने छोटे बेटे को लेकर मायके चली गई, जबकि बड़ा बेटा (यश) शुरुआत में पिता के पास रहा।
- कस्टडी हस्तांतरण: पत्नी की शिकायत पर ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’, दुर्ग ने हस्तक्षेप किया और 10 नवंबर 2021 को बड़े बेटे की कस्टडी भी मां को सौंप दी गई।
- याचिका: पिता ने फैमिली कोर्ट, बेमेतरा में अधिनियम की धारा 6 के तहत कस्टडी वापस पाने के लिए आवेदन किया।
- फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष: फैमिली कोर्ट ने 21 अप्रैल 2022 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि पिता ने बिना तलाक लिए सुमन जोशी उर्फ लीलेश्वरी नामक महिला को दूसरी पत्नी के रूप में अपने घर में रखा है, जो कि क्रूरता और दुराचरण है।
पक्षों की दलीलें
अपीलार्थी (पिता) का पक्ष: अपीलार्थी की ओर से अधिवक्ता श्री भरत राजपूत ने तर्क दिया कि बच्चे की मां के पास आय का कोई साधन नहीं है और वह बच्चे की देखभाल करने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है। उन्होंने दलील दी कि पिता की आर्थिक स्थिति बेहतर है, इसलिए बच्चे के भविष्य और शिक्षा के लिए कस्टडी उन्हें मिलनी चाहिए।
प्रत्यर्थी (मां) का पक्ष: प्रत्यर्थी की ओर से अधिवक्ता श्री अमन तंबोली ने फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अपीलार्थी ने खुद स्वीकार किया है कि वह सुमन जोशी उर्फ लीलेश्वरी के साथ दूसरी पत्नी की तरह रह रहा है। यह आचरण उसे कस्टडी पाने के लिए अयोग्य बनाता है, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कितनी भी अच्छी क्यों न हो।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा 13 का विस्तार से विश्लेषण किया, जो यह निर्धारित करती है कि बच्चे का कल्याण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
1. आर्थिक स्थिति बनाम कल्याण: पिता की आर्थिक श्रेष्ठता के तर्क को खारिज करते हुए, पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के धनवंती जोशी बनाम माधव उंडे (1998) के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:
“बच्चे का कल्याण न तो आर्थिक संपन्नता से तय होता है और न ही बच्चे की भलाई के लिए केवल गहरी मानसिक या भावनात्मक चिंता से। इसका उत्तर इन सभी कारकों के संतुलन और बच्चे के समग्र कल्याण के लिए क्या सर्वोत्तम है, यह निर्धारित करने पर निर्भर करता है।”
जजों ने स्पष्ट किया कि केवल पिता की बेहतर आर्थिक क्षमता को अधिक महत्व देना उचित नहीं होगा।
2. दूसरी पत्नी का प्रभाव: कोर्ट ने अपीलार्थी द्वारा जिरह में दी गई इस स्वीकृति को गंभीरता से लिया कि उसका सुमन जोशी के साथ प्रेम संबंध है और उसने ‘सखी सेंटर’ में स्वीकार किया था कि उसने शादी कर ली है। सुप्रीम कोर्ट के अथर हुसैन बनाम सैयद सिराज अहमद (2010) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि कस्टडी विवादों में दूसरी शादी एक महत्वपूर्ण कारक है।
“यह कोर्ट भविष्य के इस पहलू से बेखबर नहीं रह सकती कि इस बात की कोई निश्चितता नहीं है कि बच्चे को अपनी सौतेली मां से सगी मां की तुलना में बेहतर प्यार, स्नेह और अच्छा माहौल मिलेगा, जो उसे जन्म से अपनी मां से मिलता आ रहा है।”
निर्णय
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि नाबालिग बच्चा अपनी मां के साथ अच्छे माहौल में रह रहा है और उसे आवश्यक प्यार व स्नेह मिल रहा है। कोर्ट ने माना कि पिता द्वारा दूसरी पत्नी रखने का आचरण बच्चे के हितों के विपरीत है। तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
केस डीटेल्स
- केस टाइटल: लक्ष्मीकांत जोशी बनाम लोकेश्वरी उर्फ परमेश्वरी और अन्य
- केस नंबर: फर्स्ट अपील (MAT) नंबर 87 ऑफ 2022
- पीठ: जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा
- अपीलार्थी के वकील: श्री भरत राजपूत
- प्रत्यर्थी के वकील: श्री अमन तंबोली

