कर्नाटक हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत दायर एक मामले में याचिकाकर्ता को बरी करते हुए निचली अदालत और अपीलीय अदालत के समवर्ती फैसलों को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ गवाह (intermediary witness) का परीक्षण करने में विफलता और शिकायतकर्ता द्वारा यह स्वीकार करना कि ऋण राशि का भुगतान आरोपी को नहीं बल्कि उस मध्यस्थ को किया गया था, अभियोजन पक्ष के मामले के लिए एक “महत्वपूर्ण चूक” (material omission) है।
यह मामला 5,00,000 रुपये के चेक के अनादरण (dishonour) से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालतें शिकायतकर्ता द्वारा दी गई महत्वपूर्ण स्वीकृतियों और अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने में विफलता पर विचार करने में असफल रहीं। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सजा को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता श्री के.वी. विजय कुमार ने एलएक्सआईएक्स अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश, बेंगलुरु के 17 अप्रैल, 2021 के फैसले को चुनौती देते हुए यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) दायर की थी। सत्र न्यायालय ने XXI अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु द्वारा 6 अप्रैल, 2016 को पारित दोषसिद्धि आदेश की पुष्टि की थी।
शिकायतकर्ता श्री वी. मदीया ने एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी, जो एक तेलुगु फिल्म वितरक हैं, का परिचय उनके करीबी दोस्त आर. वेंकटेशप्पा ने कराया था। शिकायतकर्ता का दावा था कि 10 जून, 2013 को आरोपी ने 5,00,000 रुपये का “हैंड लोन” लिया और तीन महीने के भीतर चुकाने का आश्वासन दिया। इसके लिए आरोपी ने 10 सितंबर, 2013 का एक चेक (संख्या 320409) जारी किया। यह चेक “अपर्याप्त धनराशि” के कारण बैंक द्वारा लौटा दिया गया, जिसके बाद कानूनी कार्यवाही शुरू हुई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के विद्वान वकील, श्री ए. मधुसूदन राव ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने बचाव पक्ष की इस दलील को सही ढंग से नहीं सराहा कि विवादित चेक उन 16 चेक में से एक था जिसे आर. वेंकटेशप्पा ने चिट फंड सब्सक्रिप्शन के लिए एकत्र किया था और बाद में उसका दुरुपयोग किया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने अपने चेक के दुरुपयोग के संबंध में 7 जुलाई, 2014 को आर. वेंकटेशप्पा के खिलाफ शिकायत (Ex.D1) दर्ज कराई थी। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने 15 अक्टूबर, 2013 को आर. वेंकटेशप्पा को भेजे गए एक जवाबी नोटिस (Ex.D2) का हवाला दिया, जिसमें चिट सब्सक्रिप्शन के लिए जारी किए गए 16 चेक का विवरण दिया गया था।
वकील ने इस बात पर जोर दिया कि जिरह (cross-examination) के दौरान शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया था कि “आरोपी ने उनसे संपर्क नहीं किया था, बल्कि आर. वेंकटेशप्पा ने शिकायतकर्ता को पैसे उधार देने के लिए कहा था।” याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता की वित्तीय क्षमता पर भी सवाल उठाया और बताया कि मांग नोटिस (Ex.P3) में 5,00,000 रुपये नकद के स्रोत का खुलासा नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट में प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) को नोटिस तामील होने के बावजूद उनका प्रतिनिधित्व नहीं किया गया।
न्यायालय का विश्लेषण
न्यायमूर्ति रवि वी. होसमानी ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि आरोपी ने चेक (Ex.P1) पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए हैं, जिससे एनआई एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत धारणा (presumption) आकर्षित होती है, लेकिन इस धारणा को खंडित करने के लिए एक संभावित बचाव (probable defense) पेश करने का भार आरोपी पर था।
कोर्ट ने आरोपी के लिए सबूत के मानक और वित्तीय क्षमता विवादित होने पर सबूत का भार बदलने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एम.एस. नारायण मेनन उर्फ मणि बनाम केरल राज्य और अन्य, बासालिंगप्पा बनाम मुदिबसप्पा, और एपीएस फॉरेक्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाम शक्ति इंटरनेशनल फैशन लिंकर्स और अन्य के फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने सबूतों की जांच की और शिकायतकर्ता (PW-1) की गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए। कोर्ट ने पाया कि PW-1 ने स्वीकार किया कि “शिकायतकर्ता ने चेक बाउंस होने के बारे में आरोपी को सूचित नहीं किया था और आरोपी ने शिकायतकर्ता से हैंड लोन नहीं मांगा था, और वह राशि आर. वेंकटेशप्पा को दी गई थी, जिन्होंने आरोपी के लिए ऋण मांगा था।”
कोर्ट ने आर. वेंकटेशप्पा का परीक्षण न किए जाने को एक गंभीर खामी माना। न्यायमूर्ति होसमानी ने टिप्पणी की:
“जब यह स्वीकार किया जाता है कि शिकायतकर्ता ने आरोपी की ओर से आर. वेंकटेशप्पा को पैसे दिए थे और आरोपी ने उनसे ऋण नहीं मांगा था, तो ऐसी स्थिति में आर. वेंकटेशप्पा का परीक्षण न करना एक महत्वपूर्ण चूक (material omission) है, जो बचाव पक्ष की दलील को संभावित बनाता है और कानूनी धारणा को खंडित करता है। मौजूदा तथ्यों और परिस्थितियों में यह अभियोजन पक्ष के लिए घातक होगा।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने “आरोपी को उधार देने के लिए नकद राशि की उपलब्धता दिखाने के लिए कोई दस्तावेज न होने और आय के स्रोत का खुलासा न करने की बात स्वीकार की,” जिसे कोर्ट ने “महत्वपूर्ण चूक” करार दिया।
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने रिकॉर्ड पर मौजूद पूरी सामग्री पर विचार किए बिना केवल चेक पर हस्ताक्षर की स्वीकृति के आधार पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा:
“इस प्रकार, यह माना जाना चाहिए कि दोनों अदालतों के निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद पूरी सामग्री पर विचार किए बिना हैं और इसलिए यह विकृत (perverse) हैं।”
फैसला
हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली। एलएक्सआईएक्स अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश, बेंगलुरु द्वारा पारित 17 अप्रैल, 2021 का फैसला और XXI एसीएमएम, बेंगलुरु द्वारा पारित 6 अप्रैल, 2016 का फैसला रद्द कर दिया गया। आरोपी श्री के.वी. विजय कुमार को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध से बरी कर दिया गया और उनके जमानत/जमानती बांड डिस्चार्ज कर दिए गए।
मामले का विवरण:
केस टाइटल: श्री के.वी. विजय कुमार बनाम श्री वी. मदीया
केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन पिटीशन नंबर 36 ऑफ 2022
कोरम: न्यायमूर्ति रवि वी. होसमानी

