ओवरटाइम की गणना में HRA और ट्रांसपोर्ट अलाउंस को ‘वेतन की सामान्य दर’ में शामिल करना अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कारखाना अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948) की धारा 59(2) के तहत ओवरटाइम वेतन की गणना के लिए “वेतन की सामान्य दर” (Ordinary rate of wages) में मकान किराया भत्ता (HRA) और परिवहन भत्ता (TA) सहित अन्य प्रतिपूरक भत्ते (Compensatory Allowances) शामिल किए जाने चाहिए।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए भारत संघ (केंद्र सरकार) द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा जारी किए गए कार्यकारी निर्देश या कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandums) संसद द्वारा निर्धारित वैधानिक परिभाषा को सीमित नहीं कर सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 30 नवंबर, 2011 के आदेश से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), मद्रास बेंच के 24 दिसंबर, 2010 के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसने कर्मचारियों की मांग को अस्वीकार कर दिया था।

कानूनी विवाद का मुख्य मुद्दा यह था कि क्या कारखाना अधिनियम की धारा 59(2) के तहत ओवरटाइम वेतन की गणना करते समय मकान किराया भत्ता (HRA), परिवहन भत्ता (TA), कपड़ों की धुलाई का भत्ता (CWA) और छोटे परिवार के भत्ते (SFA) को “वेतन की सामान्य दर” का हिस्सा माना जाना चाहिए या नहीं।

केंद्र सरकार ने इन भत्तों को बाहर रखने के लिए पिछले कई दशकों में जारी किए गए विभिन्न पत्रों और ज्ञापनों का हवाला दिया:

  • रक्षा मंत्रालय का 1959 का पत्र, जिसमें कहा गया था कि ओवरटाइम केवल मूल वेतन (Basic Pay) और महंगाई भत्ते (DA) पर देय है।
  • वित्त मंत्रालय का 2002 का कार्यालय ज्ञापन, जिसने गणना से HRA, TA और CWA को बाहर रखा था।
  • श्रम एवं रोजगार मंत्रालय (2007, 2009) और रक्षा मंत्रालय (2008, 2009) के बाद के ज्ञापन, जिनमें प्रतिपूरक प्रकृति के भत्तों को बाहर रखने की बात दोहराई गई थी।
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कर्मचारी यूनियनों ने इस व्याख्या को चुनौती दी थी, जिसके परिणामस्वरूप यह कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (भारत संघ) ने तर्क दिया कि वेतन गणना में असमानता को रोकने के लिए इन भत्तों को बाहर रखा जाना आवश्यक था। केंद्र के वकील ने दलील दी कि अलग-अलग कर्मचारियों को अलग-अलग भत्ते मिल सकते हैं (जैसे कुछ कर्मचारी फैक्ट्री बस का उपयोग करते हैं जबकि कुछ TA लेते हैं, या कुछ को सरकारी आवास मिला है जबकि अन्य HRA लेते हैं)। उन्होंने कहा कि इन परिवर्तनीय भत्तों को शामिल करने से असमानता पैदा होगी। अपनी व्याख्या के समर्थन में उन्होंने ब्रिज एंड रूfs कंपनी लिमिटेड बनाम भारत संघ और भारत संघ बनाम सुरेश सी. बास्की सहित सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला दिया।

प्रतिवादी (हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री एम्प्लॉइज यूनियन) का तर्क था कि धारा 59(2) की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध है। उन्होंने कहा कि “वेतन की सामान्य दर” में मूल वेतन के साथ-साथ “ऐसे भत्ते” शामिल हैं जिनका कर्मचारी हकदार है, चाहे भत्ते की प्रकृति कुछ भी हो। उन्होंने दलील दी कि केंद्रीय मंत्रालयों के पास अधिनियम के विपरीत स्पष्टीकरण जारी करने की शक्ति नहीं है। सरकारी नीति में विसंगति को उजागर करने के लिए, उन्होंने रेल मंत्रालय के 2011 के एक पत्र की ओर इशारा किया, जिसमें स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि ओवरटाइम की गणना के लिए HRA और TA को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कारखाना अधिनियम के पाठ और शक्तियों के विभाजन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत संघ की दलीलों को अस्वीकार कर दिया।

धारा 59(2) की व्याख्या: कोर्ट ने अधिनियम की धारा 59(2) की जांच की, जो “वेतन की सामान्य दर” को “मूल वेतन जमा ऐसे भत्ते… जिसका कर्मचारी उस समय हकदार है” के रूप में परिभाषित करती है। इसमें केवल “बोनस और ओवरटाइम के वेतन” को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।

कार्यपालिका के पास कानून संशोधन की शक्ति नहीं: पीठ ने पाया कि कारखाना अधिनियम के अध्याय VI (‘वयस्कों के काम के घंटे’) और अध्याय XI (‘पूरक’) के तहत नियम बनाने या छूट देने के आदेश जारी करने की शक्ति मुख्य रूप से राज्य सरकार में निहित है। कोर्ट ने नोट किया कि विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के पास धारा 59(2) के संबंध में स्पष्टीकरण जारी करने की कोई शक्ति नहीं है।

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फैसला लिखते हुए जस्टिस राजेश बिंदल ने कहा:

“इसका अर्थ यह है कि जहां तक अध्याय VI का संबंध है, भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के पास 1948 के अधिनियम की धारा 59(2) के संदर्भ में कोई स्पष्टीकरण जारी करने की शक्ति नहीं है, विशेष रूप से इस संबंध में कि किसी कर्मचारी को ओवरटाइम के लिए देय वेतन निर्धारित करने के लिए ‘वेतन की सामान्य दर’ की गणना के उद्देश्य से क्या शामिल या बाहर किया जाना है।”

सरकारी रुख में विरोधाभास: कोर्ट ने इस तथ्य का कड़ा संज्ञान लिया कि रेल मंत्रालय ने उसी प्रावधान की अलग व्याख्या की और ओवरटाइम गणना में HRA और TA को शामिल किया, जबकि रक्षा मंत्रालय ने उन्हें बाहर रखा। कोर्ट ने कहा:

“भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय संसद के अधिनियम के किसी प्रावधान को अलग-अलग अर्थ नहीं दे सकते, जो अन्यथा 1948 के अधिनियम की धारा 59(2) के स्पष्ट पाठ से स्पष्ट है।”

नजीरों (Precedents) में अंतर: कोर्ट ने केंद्र द्वारा उद्धृत फैसलों को अलग बताया:

  • ब्रिज एंड रूफ्स कंपनी लिमिटेड के मामले को अलग माना गया क्योंकि यह ईपीएफ अधिनियम के तहत ‘उत्पादन बोनस’ से संबंधित था, न कि कारखाना अधिनियम के तहत प्रतिपूरक भत्तों से।
  • सुरेश सी. बास्की का मामला लागू नहीं पाया गया क्योंकि यह सरकारी आवास में रहने वाले कर्मचारियों के लिए HRA के काल्पनिक जोड़ (notional addition) से संबंधित था, जो वास्तविक भुगतान किए गए भत्तों के बहिष्कार से अलग है।
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कोर्ट ने गुजरात मजदूर सभा बनाम गुजरात राज्य (2020) में निर्धारित सिद्धांतों की पुष्टि की, जिसमें दोहराया गया था कि कारखाना अधिनियम एक लाभकारी कानून है जिसका उद्देश्य कामगारों को शोषण से बचाना है और लाभों को प्रतिबंधित करने वाली व्याख्याओं से बचा जाना चाहिए।

विपरीत दृष्टिकोण को खारिज किया: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से केरल हाईकोर्ट के वी.ई. जोसी बनाम फ्लैग ऑफिसर्स कमांडिंग इन चीफ हेडक्वार्टर्स (2011) के फैसले को खारिज (Overrule) कर दिया और घोषित किया कि यह “सही कानून निर्धारित नहीं करता है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 26 जून, 2009 के कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से भत्तों का अचानक बहिष्कार कानूनी अधिकार क्षेत्र से बाहर था और यह “1948 के अधिनियम की धारा 59 के शाब्दिक जनादेश के विपरीत” था।

कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की पुष्टि की कि चूंकि क़ानून केवल दो विशिष्ट अपवाद (बोनस और ओवरटाइम वेतन) प्रदान करता है, इसलिए कार्यपालिका कार्यालय ज्ञापनों के माध्यम से अधिनियम में अतिरिक्त अपवाद नहीं जोड़ सकती है।

तदनुसार, भारत संघ द्वारा दायर अपीलें खारिज कर दी गईं।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य बनाम हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री एम्प्लॉइज यूनियन और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 5185-5192 / 2016
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन

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