मद्रास हाईकोर्ट ने तिरुपुर की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (परक्राम्य लिखत अधिनियम) की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज करने में हुई 100 दिनों की देरी को माफ करने की याचिका खारिज कर दी गई थी। न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार ने स्पष्ट किया कि बिना पूर्ण विचारण (ट्रायल) के तकनीकी आधार पर शिकायत को खारिज करना अनुचित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “ठोस न्याय” (Substantial Justice) की मांग है कि दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मेसर्स एम.आर.पी. फाइनेंस (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर एक पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर IV, तिरुपुर के 23 सितंबर, 2021 के आदेश को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी एम. वेंकटचलम ने अपनी व्यावसायिक आवश्यकताओं के लिए ऋण लिया था और दायित्व के निर्वहन के लिए 6,00,000 रुपये का चेक जारी किया था। बैंक में पेश किए जाने पर चेक बाउंस हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत शिकायत दर्ज की, लेकिन इसमें 100 दिनों की देरी हो गई।
याचिकाकर्ता ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष धारा 142(b) के तहत देरी को माफ करने के लिए एक याचिका दायर की थी। इसमें कारण बताया गया कि उनके मैनेजर के.एस. कुमारराज बीमारी के कारण बिस्तर पर थे। प्रतिवादी ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देने के अलावा देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता के वकील श्री सी. प्रभाकरण ने अदालत को बताया कि मैनेजर के.एस. कुमारराज का 25 मई, 2022 को बीमारी के कारण निधन हो गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह तथ्य इस बात की पुष्टि करता है कि मैनेजर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे।
वकील ने यह भी कहा कि प्रतिवादी ने चेक जारी करने या उस पर अपने हस्ताक्षर से इनकार नहीं किया है, इसलिए वैधानिक धारणा (Statutory Presumption) उनके खिलाफ है। उन्होंने तर्क दिया कि देरी माफी याचिका को “केवल तकनीकी आधारों पर” खारिज किया गया था और “न्यायिक प्रक्रिया को शॉर्ट-सर्किट करना उचित नहीं है।” उनका कहना था कि शिकायतकर्ता को ट्रायल चलाने की अनुमति दी जानी चाहिए, जहां प्रतिवादी के बचाव का फैसला हो सके।
प्रतिवादी का तर्क
प्रतिवादी की ओर से पेश लीगल एड वकील श्री एम. मोहम्मद सैफुल्ला ने पुनरीक्षण याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि शिकायत अगस्त 2016 में देरी से दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ता ने उस समय मैनेजर के अस्पताल में भर्ती होने या इलाज कराने का कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया था। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने एक “सुविज्ञ आदेश” (Well Reasoned Order) पारित किया था, जिसमें पाया गया कि याचिकाकर्ता ने प्रत्येक दिन की देरी का कारण नहीं बताया था।
कोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण
न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुना और कहा कि एन.आई. एक्ट की धारा 142 का परंतुक (Proviso) विशेष रूप से धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज करने में देरी को माफ करने के उद्देश्य से लाया गया था।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“ठोस न्याय (Substantial justice) तभी किया जा सकता है जब पूर्ण विचारण (Full-fledged trial) के बाद याचिकाकर्ता/शिकायतकर्ता और प्रतिवादी/आरोपी दोनों की दलीलों पर विचार किया जाए।”
मैनेजर के स्वास्थ्य के संबंध में, कोर्ट ने के.एस. कुमारराज के मृत्यु प्रमाण पत्र को संज्ञान में लिया। कोर्ट ने कहा:
“अब यह देखा गया है कि पूर्व मैनेजर के.एस. कुमारराज की मृत्यु हो गई है और मृत्यु प्रमाण पत्र पेश किया गया है जो पुष्टि करता है कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। हालांकि मृत्यु पांच साल बाद हुई, लेकिन दलीलों और रिकॉर्ड के आधार पर इस कोर्ट का मानना है कि पूर्व मैनेजर के.एस. कुमारराज का स्वास्थ्य ठीक नहीं था।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण मामले (CRL RC No. 1107 of 2022) को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर IV, तिरुपुर द्वारा दिए गए 23.09.2021 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें देरी माफी की याचिका खारिज कर दी गई थी।
कोर्ट ने शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को माफ कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह “शिकायत को फाइल पर ले और कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर इसका निस्तारण करे।”
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने प्रतिवादी के लिए लीगल एड वकील श्री एम. मोहम्मद सैफुल्ला द्वारा दी गई सेवाओं की सराहना की और तमिलनाडु राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को उनका पारिश्रमिक देने का निर्देश दिया।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: एम.आर.पी. फाइनेंस बनाम एम. वेंकटचलम
- केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन केस नंबर 1107 ऑफ 2022 (CRL RC No. 1107 of 2022)
- कोरम: न्यायमूर्ति एम. निर्मल कुमार

