जमीनी अदालतों में ही बसती है ‘सच्ची न्याय’: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने युवा वकीलों को जिला अदालतों में प्रैक्टिस के लिए प्रोत्साहित करने की अपील की

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि “सच्चा न्याय” अपीलीय मंचों (हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर की अदालतों — यानी जिला न्यायालयों — में होता है, जहां आम नागरिक पहली बार अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पहुंचता है।

दिल्ली हाईकोर्ट परिसर में बार काउंसिल ऑफ दिल्ली द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वे युवा वकीलों को जिला अदालतों में प्रैक्टिस के लिए “प्रोत्साहन” दें, ताकि न्याय व्यवस्था की जड़ें और मजबूत हों।

“हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि न्याय केवल अपीलीय मंचों में नहीं होता। सच्चा न्याय तो ज़मीनी अदालतों में होता है, क्योंकि आम नागरिक का अधिकारों के लिए पहला संपर्क जिला अदालत से ही होता है,” उन्होंने कहा।

मुख्य न्यायाधीश ने जिला अदालतों को ‘निचली अदालतें’ कहे जाने को ‘गलत ब्रांडिंग’ बताया और कहा कि ये अदालतें स्वतंत्र न्यायपालिका का बेहद महत्वपूर्ण अंग हैं और अपीलीय मंचों से कहीं अधिक व्यावहारिक और निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने कहा—

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“दावा करता हूं कि अगर किसी वादकारी को इस ‘प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र’ यानी जिला अदालत में ही संतोषजनक न्याय मिल जाए, तो उसे न तो बड़े अस्पतालों में रेफर करने की ज़रूरत पड़ेगी और न ही किसी ट्रॉमा सेंटर तक जाने की।”

CJI सूर्यकांत, जो नवंबर 2025 में भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश बने, ने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत जिला अदालत से करने के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि जिला अदालतें “व्यावसायिक संस्कृति गढ़ने के केंद्र” होती हैं और वहीं से वकीलों की ठोस नींव तैयार होती है।

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उन्होंने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) और अन्य प्रमुख संस्थानों के छात्रों में “सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में ही प्रैक्टिस करने की प्रवृत्ति” को गलत बताया और कहा कि इससे जमीनी न्याय प्रणाली को नुकसान होता है।

“किसी कारणवश, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ या अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों से निकलने वाले स्नातकों में यह गलत धारणा बन गई है कि उन्हें सीधे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करनी है, जबकि उन्हें पहले जिला अदालतों से जुड़ना चाहिए।”

मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों से अपील की कि वे इस रुझान को बदलने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं बनाएं।

“मैं सुप्रीम कोर्ट में अपने सहयोगियों और हाई कोर्ट से अनुरोध करूंगा कि वे जिला अदालतों में प्रैक्टिस को प्रोत्साहित करें और ऐसी संस्कृति विकसित करें जो हमारी बार को और मजबूत करे।”

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मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि तकनीक ड्राफ्टिंग में मददगार हो सकती है, लेकिन मस्तिष्क का प्रयोग करना सीखना पड़ेगा। उन्होंने तकनीकी सहायता के महत्व को स्वीकार किया लेकिन यह स्पष्ट किया कि न्यायिक विवेक और सोचने की क्षमता का कोई विकल्प नहीं है।

इस समारोह में सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीशों, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के पदाधिकारियों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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