पटना हाईकोर्ट ने बिहार समेत अन्य राज्यों की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जर स्थिति पर गहरी चिंता जताई है और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को निर्देश दिया है कि वह डॉक्टरों के “बड़े पैमाने पर खाली पदों” को भरने के लिए राज्य सरकारों को समयबद्ध भर्ती अभियान शुरू करने को कहे।
न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी की एकल पीठ ने 17 जनवरी को यह आदेश दिया, जब बिहार के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में कार्यरत कई चिकित्सकों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की गई। याचिकाकर्ताओं ने एनएमसी के 17 अप्रैल 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें मेडिकल फैकल्टी के लिए फेस-बेस्ड आधार सत्यापन और GPS लोकेशन साझा करना अनिवार्य कर दिया गया था।
हालांकि, कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता केवल निजता के अधिकार के उल्लंघन का मुद्दा उठा रहे हैं, जो पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता आधार से लिंक्ड बायोमेट्रिक सिस्टम को चुनौती देने के लिए निजता के अधिकार के उल्लंघन के अतिरिक्त कोई और ठोस आधार लेकर नहीं आए हैं।”
फिर भी, न्यायमूर्ति चौधरी ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि, “यदि किसी मेडिकल ऑफिसर या फैकल्टी सदस्य को लगातार 24, 48 या यहां तक कि 72 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर किया जाए, तो ऐसे अधिक बोझ तले दबे, अगर कहें तो प्रताड़ित, फैकल्टी सदस्यों के पलायन की स्थिति बनी रहेगी।” उन्होंने आगाह किया कि यद्यपि याचिकाएं खारिज की जा रही हैं, परंतु ये कर्मी उपस्थिति दर्ज कराने से बचने के अन्य रास्ते तलाशते रहेंगे।
अदालत ने राज्य संचालित और सरकारी सहायता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों की दुर्दशा का भी जिक्र किया, जहां फैकल्टी की भारी कमी, अयोग्य अनुबंधित शिक्षक और अपर्याप्त तकनीकी व प्रशासनिक स्टाफ के सहारे संस्थान जैसे-तैसे चल रहे हैं।
कोर्ट ने कहा, “सिर्फ फैकल्टी की उपस्थिति सुनिश्चित करने से राज्यों के स्वास्थ्य विभागों की जर्जर स्थिति नहीं बदलेगी। हालात तब ही सुधरेंगे जब खाली पदों को भरा जाएगा।”
इसलिए, अदालत ने नेशनल मेडिकल कमीशन को निर्देश दिया कि वह संबंधित राज्य सरकारों को निर्देश दे कि वे मेडिकल शिक्षण सेवा में खाली पड़े पदों को भरने के लिए एक समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि आदेश की प्रति एनएमसी के सचिव को भेजी जाए ताकि छह महीने के भीतर न्यायालय की टिप्पणियों को लागू किया जा सके।

