झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जब शादी पूरी तरह से “डेड वुड” (मृतप्राय/निष्प्राण) बन चुकी हो, तो उसे जबरन बनाए रखने का कोई मतलब नहीं है। अदालत ने पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे अलगाव और पति द्वारा दूसरी शादी कर लेने के तथ्यों को देखते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने तलाक की डिक्री को बरकरार रखते हुए प्रतिवादी-पति, जो सीमा सुरक्षा बल (BSF) में कांस्टेबल है, को निर्देश दिया कि वह अपनी पहली पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए कुल ₹35,000 प्रति माह का भुगतान करे। कोर्ट ने हर दो साल में इस राशि में 5% की बढ़ोतरी का भी आदेश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक वैवाहिक अपील (F.A. No. 324 of 2023) से जुड़ा है, जिसे पत्नी (अपीलकर्ता) ने प्रधान न्यायाधीश, अतिरिक्त फैमिली कोर्ट-II, धनबाद के 18 अप्रैल, 2023 के फैसले के खिलाफ दायर किया था। फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर पति की तलाक की याचिका (Original Suit No. 839 of 2021) को स्वीकार कर लिया था।
दोनों का विवाह 23 नवंबर, 2008 को हुआ था और उनकी एक बेटी है। पति का आरोप था कि पत्नी का व्यवहार अपमानजनक था और वह अभद्र भाषा का प्रयोग करती थी। पति के अनुसार, पत्नी 16 सितंबर, 2014 को बिना उसकी सहमति के ससुराल छोड़कर चली गई और बाद में उसने पति व ससुराल वालों के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए। फैमिली कोर्ट में पत्नी अपना लिखित बयान दर्ज कराने में विफल रही थी, जिसके बाद कोर्ट ने पति के साक्ष्यों के आधार पर तलाक मंजूर कर लिया था।
हाईकोर्ट में दलीलें और बदला हुआ परिदृश्य
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता-पत्नी के वकील ने स्वीकार किया कि अब साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची है, क्योंकि प्रतिवादी-पति ने दूसरी महिला के साथ संबंध बना लिए हैं। ऐसी स्थिति में, उन्होंने मुख्य रूप से गुजारा भत्ते (एलिमनी) की मांग पर जोर दिया, क्योंकि नाबालिग बेटी मां के साथ रह रही है और उसे आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी-पति ने शपथ पत्र दायर कर स्वीकार किया कि उसने दूसरी शादी कर ली है और उस शादी से एक बेटा भी है। उसने बताया कि वह BSF में कांस्टेबल है और नवंबर 2025 तक उसका सकल मासिक वेतन ₹86,706 है। पति ने तर्क दिया कि उस पर अपने बीमार पिता, अलग रह रही बहन और दूसरे परिवार की भी जिम्मेदारी है, इसलिए उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति को देखते हुए ही भरण-पोषण तय किया जाए।
कोर्ट का विश्लेषण: शादी बन चुकी है ‘डेड वुड’
खंडपीठ ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हैं और पति ने दूसरी शादी भी कर ली है, जिससे सुलह की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। कोर्ट ने कहा:
“मौजूदा परिस्थितियों में, इस अदालत का सुविचारित मत है कि पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध अब ‘डेड वुड मैरिज’ (मृतप्राय शादी) बन गया है। यह संबंध अब निष्प्राण है और इसका कोई भावनात्मक या व्यावहारिक मूल्य नहीं बचा है।”
सुप्रीम कोर्ट के दुर्गा प्रसन्न त्रिपाठी बनाम अरुंधति त्रिपाठी (2005) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे रिश्ते में जोड़े को जबरदस्ती रहने के लिए मजबूर करना केवल उनकी पीड़ा को बढ़ाएगा। “डेड वुड” को खेने (sailing) से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए, कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा दी गई तलाक की डिक्री में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
गुजारा भत्ते का निर्धारण
भरण-पोषण की राशि तय करने के लिए कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले राखी साधुखान बनाम राजा साधुखान (2025) का संदर्भ लिया। पति के ₹86,706 के सकल वेतन को आधार मानते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश दिए:
- पत्नी के लिए: उसके जीवनयापन के लिए ₹25,000 प्रति माह की राशि उचित और न्यायसंगत मानी गई।
- बेटी के लिए: उसकी शिक्षा और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ₹10,000 प्रति माह तय किए गए।
फैसला और निर्देश
हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए:
- प्रतिवादी-पति को कुल ₹35,000 हर महीने की 10 तारीख तक अपीलकर्ता-पत्नी के खाते में जमा करने होंगे।
- महंगाई को देखते हुए, इस राशि में हर दो साल बाद 5% की वृद्धि की जाएगी।
- बेटी के बालिग होने तक यह राशि मां के खाते में जाएगी, और उसके बाद सीधे बेटी के बैंक खाते में जमा की जाएगी।
केस विवरण:
- केस टाइटल: सुषमा देवी बनाम राज कुमार प्रसाद
- केस नंबर: F.A. No. 324 of 2023
- कोरम: जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय
- अपीलकर्ता के वकील: श्री विजय बहादुर सिंह, अधिवक्ता
- प्रतिवादी के वकील: सुश्री निशि रानी, अधिवक्ता

