इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष नियमावली, 2015’ के तहत मुआवजे से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता कि मेडिकल रिपोर्ट में “पेनिट्रेटिंग इंजरी” (अंदरूनी चोट) के सबूत नहीं मिले हैं।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की डिवीजन बेंच ने एक नाबालिग पीड़िता की याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 10 दिनों के भीतर पीड़िता को 3,00,000 रुपये का मुआवजा प्रदान करें। कोर्ट ने कहा कि यह योजना पीड़ितों के दर्द और आघात को कम करने के लिए बनाया गया एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) है, और शारीरिक चोट की अनुपस्थिति मुआवजे से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका पीड़िता (उसकी मां के माध्यम से) द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने ‘उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष नियमावली, 2015’ के तहत मुआवजा प्रदान करने में अधिकारियों की निष्क्रियता को चुनौती दी थी।
याचिका के अनुसार, पीड़िता के साथ 7 मार्च, 2025 को यौन अपराध घटित हुआ था। पुलिस थाना कटरा बाजार, जिला गोंदा में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 4 के तहत एफआईआर (केस क्राइम नंबर 048/2025) दर्ज की गई। पुलिस ने जांच के बाद 25 जून, 2025 को आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया।
पीड़िता ने योजना के अनुबंध संख्या 1 के क्रमांक 6 के अनुसार 3 लाख रुपये के कुल मुआवजे का दावा किया था। हालांकि, जिला संचालन समिति, गोंदा ने 24 दिसंबर, 2025 को हुई बैठक में इस दावे को रोक दिया/अस्वीकार कर दिया। समिति का तर्क था कि घटना के एक दिन बाद ही मेडिकल जांच होने के बावजूद, मेडिको-लीगल और पैथोलॉजी रिपोर्ट में “पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट” के कोई सबूत नहीं मिले। समिति ने निर्णय लिया कि यदि भविष्य में अदालत द्वारा आरोपी को दोषी ठहराया जाता है, तो मुआवजे के दावे पर दोबारा विचार किया जाएगा।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की वकील, सुश्री अंजुम आरा ने तर्क दिया कि चार्जशीट में स्पष्ट रूप से पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट का मामला बनता है। उन्होंने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद “आज तक याचिकाकर्ता को एक नया पैसा नहीं दिया गया है,” जबकि नियमानुसार एफआईआर पर 1 लाख और चार्जशीट पर 2 लाख रुपये मिलने चाहिए थे।
राज्य के वकील, श्री शैलेश चंद्र तिवारी ने संचालन समिति के निर्णय का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि 8 मार्च, 2025 की चोट रिपोर्ट (Injury Report) में आंतरिक जांच पर ‘पेनिट्रेटिंग इंजरी’ का कोई सबूत नहीं मिला है। उनका कहना था कि “इस योजना के तहत मुआवजा देने के लिए पूर्व शर्त यह है कि चोट रिपोर्ट में चोट पाई जानी चाहिए,” जो इस मामले में अनुपस्थित थी। इसलिए, समिति ने सही निर्णय लिया था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट की धारा 3 और 4 का विश्लेषण किया और पाया कि धारा 3 के तहत “पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट” की परिभाषा में किसी भी हद तक पेनीट्रेशन या शरीर के अंगों के साथ छेड़छाड़ शामिल है, जिसके लिए आवश्यक रूप से दिखाई देने वाली शारीरिक चोट का होना जरूरी नहीं है।
बेंच ने टिप्पणी की:
“पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के साथ पठित धारा 3 के अवलोकन से हमारा विचार है कि धारा 3(a), 3(b), 3(c) और 3(d) में दिए गए कार्य पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट की श्रेणी में आएंगे और यह स्पष्ट है कि इसे साबित करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि कोई ऐसी चोट हो जो निर्णायक रूप से उक्त हमले को सिद्ध करे।”
इस स्थिति को पुख्ता करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला दिया:
- दिलीप कुमार उर्फ दल्ली बनाम उत्तरांचल राज्य (क्रिमिनल अपील नंबर 1005 ऑफ 2013, निर्णय दिनांक 16 जनवरी, 2025): सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “यौन हमले को साबित करने के लिए शारीरिक चोटें आवश्यक नहीं हैं” और पीड़ित आघात पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया करते हैं।
- लोक मल उर्फ लोकू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (क्रिमिनल अपील नंबर 325 ऑफ 2011, निर्णय दिनांक 7 मार्च, 2025): सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि “पीड़िता के निजी अंगों पर चोटों की अनुपस्थिति अभियोजन पक्ष के मामले के लिए हमेशा घातक नहीं होती,” क्योंकि यह विशिष्ट तथ्यों पर निर्भर करता है, जैसे कि क्या पीड़िता को जबरदस्ती चुप कराया गया था।
यूपी सरकार की योजना की शर्तों के संबंध में, हाईकोर्ट ने राज्य की इस व्याख्या को खारिज कर दिया कि चोट रिपोर्ट में निश्चित रूप से ‘पेनिट्रेटिव इंजरी’ होनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“योजना के उक्त प्रावधान को पढ़ने से हमारा मानना है कि पीड़ित को लाभ देने के लिए तीन दस्तावेजों, यानी एफआईआर, चोट रिपोर्ट और चार्जशीट का होना आवश्यक है।”
बेंच ने जोर देकर कहा कि संचालन समिति ट्रायल कोर्ट (विचारण न्यायालय) की भूमिका नहीं निभा सकती। जब तक एफआईआर और चार्जशीट पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत अपराध का संकेत देते हैं, “संचालन समिति द्वारा आगे कोई जांच करने की आवश्यकता नहीं है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि यह योजना एक लाभकारी विधान है:
“योजना के तहत, पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट की पीड़िता को मुआवजा इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि उसे हमले के दौरान चोटें आई हैं, बल्कि इसलिए दिया जाता है क्योंकि उसने उस हमले को झेला है।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संचालन समिति का निष्कर्ष “कानून में किसी भी आधार के बिना और योजना के विपरीत है।”
कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश दिया:
“चूंकि वर्तमान मामले में आरोप पत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है, हम निर्देश देते हैं कि आज से 10 दिनों की अवधि के भीतर पीड़िता को 3 लाख रुपये का मुआवजा तुरंत दिया जाए।”
इन निर्देशों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: विक्टिम एक्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा प्रमुख सचिव समाज कल्याण विभाग, लखनऊ व अन्य
- केस नंबर: रिट-सी नंबर 12085 ऑफ 2025
- कोरम: जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला
- याचिकाकर्ता के वकील: अंजुम आरा
- प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी.

