मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 13 साल पुराने एक दीवानी मुकदमे (Civil Suit) को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। यह फैसला तब आया जब सीधी (Sidhi) के तृतीय व्यवहार न्यायाधीश (वरिष्ठ खंड) ने कार्य की अधिकता का हवाला देते हुए हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित छह सप्ताह की समय सीमा के भीतर मामले का निपटारा करने में असमर्थता जताई थी।
न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रधान जिला न्यायाधीश, सीधी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत दायर स्थानांतरण आवेदन को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पीठासीन अधिकारी के पास समय का अभाव है, तो न्याय के हित में मामले को किसी अन्य सक्षम न्यायाधीश को सौंपा जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला जनवरी 2013 से लंबित एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, इस मामले में अंतिम बहस (Final Arguments) के लिए पहली बार 23 नवंबर 2023 की तारीख तय की गई थी। इसके बाद से लगातार समय की कमी या अन्य कारणों से मामले को टाला जा रहा था और पिछले दो वर्षों से अंतिम बहस नहीं हो सकी थी।
इस देरी से परेशान होकर याचिकाकर्ताओं ने पहले संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उस याचिका (एम.पी. नंबर 6442/2025) का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने 21 नवंबर 2025 को निचली अदालत को निर्देश दिया था कि वह छह सप्ताह के भीतर अंतिम बहस सुनकर मुकदमे का फैसला करे।
निचली अदालत का रुख और विवाद
जब हाईकोर्ट का 21 नवंबर 2025 का आदेश 25 नवंबर को विचारण न्यायालय (Trial Court) के समक्ष पेश किया गया, तो पीठासीन अधिकारी ने आदेश पत्रिका (Order Sheet) में लिखा कि छह सप्ताह के भीतर मुकदमे का निर्णय करना उनके लिए “असंभव” है। अदालत ने तर्क दिया कि पीठासीन अधिकारी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के प्रभार में हैं और उनके पास किशोर न्याय बोर्ड (JJB) का भी जिम्मा है, इसलिए कार्यभार अधिक होने के कारण वे समय सीमा का पालन नहीं कर सकते।
इसके बाद, अदालत ने अंतिम बहस के लिए 8 जनवरी 2026 की तारीख तय कर दी, जो हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित छह सप्ताह की समय सीमा के बाहर थी।
इस स्थिति को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने प्रधान जिला न्यायाधीश, सीधी के समक्ष सीपीसी की धारा 24 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया और मांग की कि चूंकि पीठासीन अधिकारी समय पर निर्णय देने में अनिच्छुक हैं, इसलिए केस को ट्रांसफर किया जाए। हालांकि, प्रधान जिला न्यायाधीश ने 18 दिसंबर 2025 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि संबंधित अदालत में वाकई काम का दबाव अधिक है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति विवेक जैन ने निचली अदालत के दृष्टिकोण पर कड़ी आपत्ति जताई। हाईकोर्ट ने नोट किया कि 13 साल पुराने इस मुकदमे में केवल अंतिम बहस सुनी जानी है और फैसला सुनाया जाना है, फिर भी अदालत ने समय सीमा का पालन करने का प्रयास तक नहीं किया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“अदालत ने मामले को हाथ में लेने का कोई प्रयास नहीं किया और छह सप्ताह के बाद की तारीख तय कर दी। यह एक तरह की ‘दिखावा’ (oneupmanship) हो सकती है या विद्वान विचारण न्यायाधीश ने हाईकोर्ट के आदेश का बुरा मान लिया हो। इस तरह के दृष्टांत वादी के मन में न्यायिक अनुशासन और पदानुक्रम (hierarchy) के विघटन का दुखद संकेत देते हैं, जब एक सिविल जज हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर मामले को सूचीबद्ध करने से भी इनकार कर देता है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि 8 जनवरी 2026 को भी मामले को 3 फरवरी 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया। पीठासीन अधिकारी के रवैये को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि वे मुकदमे का निर्णय करने की स्थिति में नहीं हैं।
निर्णय
हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए प्रधान जिला न्यायाधीश, सीधी द्वारा पारित 18 दिसंबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया:
“प्रधान जिला न्यायाधीश, सीधी से अनुरोध है कि वे इस मुकदमे को समान अधिकार क्षेत्र वाली किसी अन्य अदालत में स्थानांतरित करें, जिसके पास 13 साल पुराने मुकदमे का फैसला करने के लिए पर्याप्त न्यायिक समय हो, जिसमें केवल अंतिम बहस सुनी जानी है और निर्णय पारित किया जाना है।”
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने आदेश की एक प्रति जिला न्यायाधीश (निरीक्षण) और सीधी जिले के पोर्टफोलियो जज को सूचनार्थ भेजने का निर्देश दिया।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: राजराखन सिंह व अन्य बनाम राजकरण सिंह (मृत) द्वारा विधिक प्रतिनिधि जय सिंह व अन्य
- केस नंबर: मिसलेनियस पिटीशन नंबर 51 ऑफ 2026
- बेंच: न्यायमूर्ति श्री विवेक जैन

