वसीयत की वैधता पर प्रोबेट कार्यवाही लंबित होने के बावजूद जालसाजी के लिए आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि किसी वसीयत (Will) की वैधता को लेकर प्रोबेट कार्यवाही (Probate Proceedings) सिविल कोर्ट में लंबित है, उसी दस्तावेज के संबंध में जालसाजी (Forgery) के आरोपों पर एफआईआर दर्ज करने और आपराधिक जांच करने पर कोई रोक नहीं है।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 467 और 471 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सिविल और आपराधिक कार्यवाही “अलग-अलग क्षेत्रों” (Distinct Spheres) में काम करती हैं और जालसाजी एक स्वतंत्र अपराध है, जिसके लिए सिविल मुकदमे के परिणाम की परवाह किए बिना दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका बबीता चोपड़ा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के 4 जून, 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। यह विवाद उनके दिवंगत भाई, श्री नरेंद्र किशोर खन्ना की संपत्ति से जुड़ा है, जिनका 22 मई, 2013 को निधन हो गया था।

याचिकाकर्ता का दावा था कि उनके भाई ने 29 अप्रैल, 2011 को एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित की थी, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी बहन (याचिकाकर्ता) और मां, श्रीमती माहेश्वरी देवी के नाम कर दी थी, जबकि अपनी अलग रह रही पत्नी और बेटे, नितेश खन्ना (प्रतिवादी संख्या 2) को बेदखल कर दिया था। भाई की मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता और उनकी मां ने हाईकोर्ट में प्रोबेट याचिका (Test Case No. 12/2014) दायर की।

प्रोबेट कार्यवाही के दौरान, प्रतिवादी संख्या 2 ने आरोप लगाया कि वसीयत फर्जी है। उन्होंने वसीयत पर मौजूद हस्ताक्षरों की तुलना दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के पास उपलब्ध 2004 के एक पत्र से करने की अनुमति प्राप्त की। प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा नियुक्त एक निजी हस्तलेख विशेषज्ञ ने 10 दिसंबर, 2023 को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें हस्ताक्षरों के मेल न खाने की बात कही गई। इस रिपोर्ट के आधार पर, प्रतिवादी संख्या 2 ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके परिणामस्वरूप पुलिस थाना लक्ष्मी नगर में एफआईआर संख्या 197/2024 दर्ज की गई।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि वसीयत की वैधता का मामला प्रोबेट केस में न्यायालय के समक्ष विचाराधीन (Sub-judice) है, जहां भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के अनुसार दस्तावेज को साबित किया जाना आवश्यक है। यह भी तर्क दिया गया कि एफआईआर पूरी तरह से एक निजी हस्तलेख विशेषज्ञ की राय पर आधारित है, जो केवल “सलाहकारी है और निर्णायक नहीं”। इसके अलावा, 2004 के हस्ताक्षरों की तुलना 2011 की वसीयत से करना समय के अंतराल के कारण विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सरदूल सिंह बनाम नसीब कौर (1987) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जब वसीयत की वैधता सिविल कोर्ट में परखी जा रही हो, तो आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इसके विपरीत, प्रतिवादी संख्या 2 के वकील ने तर्क दिया कि शिकायत में संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) का खुलासा होता है, इसलिए जांच आवश्यक है। ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड के फैसलों का हवाला देते हुए, यह कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देकर सही किया है। प्रतिवादी ने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने संपत्ति छिपाई है और वसीयत पर लगी तस्वीर 2004 की है, जो प्रतिरूपण (Impersonation) और जालसाजी का संकेत देती है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि लंबित सिविल मुकदमे के कारण आपराधिक प्रक्रिया को रोक दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां एक सिविल कोर्ट किसी दस्तावेज की वैधता को “संभावनाओं की प्रबलता” (Preponderance of Probabilities) की कसौटी पर परखता है, वहीं आपराधिक कानून उन अपराधों से निपटता है जो बेईमानी के इरादे से किए जाते हैं।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

“जालसाजी, दस्तावेजों की कूटरचना और गलत लाभ के लिए उनका उपयोग केवल सिविल अवैधता का मामला नहीं है, बल्कि आपराधिक कानून के तहत स्वतंत्र अपराध हैं। इसलिए, किसी दस्तावेज की वैधता के संबंध में सिविल न्यायनिर्णयन आपराधिक अभियोजन को नहीं रोक सकता, जहां अपराधों (जैसे यहां जालसाजी) के तत्व प्रथम दृष्टया प्रकट होते हैं, क्योंकि दोनों उपचार अपने उद्देश्य, दायरे और सबूत के मानक में भिन्न हैं।”

सरदूल सिंह के मामले को वर्तमान मामले से अलग करते हुए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कमलादेवी अग्रवाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, सैयदस्करी हैदर अली ऑगस्टाइन इमान बनाम राज्य और हालिया निर्णय कात्यायनी बनाम सिद्धार्थ पी.एस. रेड्डी (2025) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक चरण में ही “मिनी-ट्रायल” (Mini-trial) आयोजित करके या सबूतों का समय से पहले मूल्यांकन करके आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना अनुचित है।

हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट के महत्व पर, कोर्ट ने कहा कि यह जांच का विषय है:

“हस्तलेख विशेषज्ञ की राय की सत्यता या अन्यथा का पता लगाने के लिए कोई मिनी ट्रायल आयोजित नहीं किया जा सकता है, और न ही यह वसीयत की असलियत पर कोई निष्कर्ष दे सकता है। ये मुद्दे जांच के विषय हैं जिन्हें आपराधिक जांच के दौरान परखा जाना चाहिए।”

कोर्ट ने एम.एस. शेरिफ और अन्य बनाम मद्रास राज्य और अन्य के मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि “जनहित की मांग है कि आपराधिक न्याय त्वरित और सुनिश्चित होना चाहिए” और यह अवांछनीय है कि आपराधिक अभियोजन तब तक प्रतीक्षा करे जब तक कि सिविल मुकदमे, जो अक्सर सालों तक चलते हैं, समाप्त न हो जाएं।

निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया साजिश, प्रतिरूपण और जालसाजी सहित संज्ञेय अपराधों का खुलासा करते हैं। तदनुसार, कोर्ट ने माना कि मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देना उचित था।

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कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा:

“उपरोक्त चर्चा के आलोक में, यह माना जाता है कि इस प्रारंभिक चरण में एफआईआर को रद्द करने का कोई आधार मौजूद नहीं है। वर्तमान याचिका में कोई योग्यता नहीं है, जिसे एतद्द्वारा खारिज किया जाता है।”

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: बबीता चोपड़ा बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) और नितेश खन्ना
  • केस नंबर: W.P. CRL. 2202/2024
  • कोरम: न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा

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