पंचकूला प्लॉट पुनःआवंटन मामला: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एजेएल को आरोपों से किया मुक्त, कहा– चीटिंग या साजिश का प्रथम दृष्टया मामला नहीं

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंचकूला में प्लॉट के पुनःआवंटन से जुड़े मामले में पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के खिलाफ आरोप तय करने के विशेष सीबीआई अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से आरोपित अपराधों के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया भी स्थापित नहीं होते।

न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया की पीठ ने 25 फरवरी के आदेश में 16 अप्रैल 2021 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें विशेष सीबीआई अदालत ने IPC की धारा 120-बी और 420 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोप तय किए थे। अदालत ने इसके साथ ही समस्त आगे की कार्यवाही भी रद्द करते हुए याचिकाकर्ताओं को आरोपमुक्त कर दिया।

अदालत ने कहा कि आरोप तय करने के लिए ऐसा सामग्री होना आवश्यक है जिससे अपराध के तत्वों के अस्तित्व पर राय बन सके। वर्तमान मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है।

अदालत ने कहा,
“अभियोजन की कार्यवाही जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा… आरोप तय करने और डिस्चार्ज आवेदन खारिज करने संबंधी आदेश तथा उससे उपजी समस्त कार्यवाही निरस्त की जाती है और याचिकाकर्ता आरोपमुक्त किए जाते हैं।”

विवाद सेक्टर-6, पंचकूला में स्थित उस प्लॉट से संबंधित है जिसे 1982 में हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (HUDA), वर्तमान में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण, ने एजेएल को आवंटित किया था। निर्माण समयसीमा में पूरा न होने के कारण 1992 में प्लॉट पुनःग्रहण कर लिया गया। एजेएल की अपीलें 1995 और 1996 में खारिज हो गईं।

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2005 में हुड्डा के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्लॉट मूल दरों पर पुनःआवंटित किया गया। वर्ष 2016 में राज्य की सतर्कता एजेंसी ने मामला दर्ज किया, जिसे बाद में सीबीआई ने अपने हाथ में ले लिया। आरोप था कि पुनःआवंटन से सरकारी खजाने को नुकसान हुआ।

हाईकोर्ट ने कहा कि पुनःआवंटन का निर्णय प्राधिकरण ने लिया था और उसे सर्वसम्मति से अनुमोदित किया गया था। इसे न तो कभी निरस्त किया गया और न ही किसी न्यायालय ने अवैध घोषित किया।

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अदालत ने कहा कि प्राधिकरण के सदस्यों द्वारा बिना आपत्ति सहमति दिए जाने के बाद बाद में दिए गए बयानों के आधार पर उस निर्णय को “अप्रासंगिक या फर्जी” नहीं कहा जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआई ने केवल प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हुड्डा के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि निर्णय को अनुमोदित करने वाले अन्य सदस्यों को नजरअंदाज किया गया, जिससे जांच की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है।

अदालत ने रिकॉर्ड किया कि पुनःआवंटन आज भी वैध है, रद्द नहीं हुआ है और एजेएल ने पुनःआवंटन राशि व विस्तार शुल्क जमा कर निर्माण पूरा किया है। 14 अगस्त 2014 को प्राधिकरण ने उसे ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट भी जारी किया।

अदालत ने कहा कि प्राधिकरण की ओर से किसी नुकसान की शिकायत नहीं की गई और न ही एजेएल या अन्य आरोपियों से किसी कथित हानि की भरपाई मांगी गई। सरकारी ऑडिट आपत्तियां भी वापस ले ली गई थीं।

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अदालत ने यह भी नोट किया कि एफआईआर प्राधिकरण की शिकायत पर नहीं बल्कि सतर्कता की स्रोत रिपोर्ट के आधार पर दर्ज की गई थी।

अदालत ने कहा,
“सीबीआई द्वारा स्वयं पुनःआवंटन को अवैध ठहराकर आपराधिक मामला दर्ज करना कानून में ज्ञात किसी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।”

अदालत ने कहा कि ऐसा कोई सामग्री नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि एजेएल और हुड्डा ने मिलकर धोखाधड़ी करने के उद्देश्य से प्लॉट की बहाली कराई।

“एजेएल द्वारा प्लॉट बहाल करने का अनुरोध किया गया था, किंतु ऐसा कोई सामग्री नहीं है जो यह दर्शाए कि उसने हुड्डा के साथ मिलकर धोखाधड़ीपूर्ण या बेईमानी से मूल दरों पर प्लॉट बहाल कराया,” अदालत ने कहा।

इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को आरोपमुक्त करते हुए आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।

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