एफआईआर दर्ज न होने पर रिट याचिका पोषणीय नहीं, धारा 175 बीएनएसएस के तहत मजिस्ट्रेट के पास है उपाय: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं करती है, तो इसके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करना उचित कानूनी उपाय नहीं है। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसी शिकायतों के लिए उचित मंच भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175 के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट का न्यायालय है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने एकल पीठ (Single Bench) के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास भेजने का निर्णय “पूरी तरह से तर्कसंगत” और कानून के अनुसार है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील संजना गुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य (M.A.T. 1117 of 2025) मामले में दायर की गई थी, जिसमें एकल पीठ द्वारा डब्ल्यूपीए 8817 ऑफ 2025 में पारित 5 मई, 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

अपीलकर्ता/रिट याचिकाकर्ता संजना गुप्ता ने पुलिस की निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका दावा था कि 25 जनवरी, 2025 को हुई एक घटना के संबंध में उन्होंने 28 जनवरी, 2025 को इंस्पेक्टर-इन-चार्ज (प्रतिवादी संख्या 4) को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।

एकल पीठ ने रिट याचिका का निस्तारण करते हुए टिप्पणी की थी:

“चूंकि पुलिस ने कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है, इसलिए याचिकाकर्ता का दायित्व होगा कि वह कानून के प्रासंगिक प्रावधानों को लागू करते हुए क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट से संपर्क करे। विद्वान मजिस्ट्रेट शिकायत किए गए अपराध की प्रकृति का आकलन करेंगे और यह भी सुनिश्चित करेंगे कि क्या जांच के लिए कोई मामला बनता है, और उसके बाद कानून के अनुसार आवश्यक निर्देश पारित करेंगे।”

इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने वर्तमान अपील दायर की थी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता का तर्क: अपीलकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता श्री अनिर्बान मित्रा ने तर्क दिया कि लिखित शिकायत में निजी प्रतिवादियों द्वारा संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) किए जाने का खुलासा हुआ था। उन्होंने कहा कि बीएनएसएस, 2023 की धारा 175(1) के तहत, एक पुलिस अधिकारी किसी भी संज्ञेय मामले की जांच करने के लिए सशक्त और बाध्य है।

श्री मित्रा ने कहा कि एकल पीठ यह देखने में विफल रही कि पुलिस अधिकारियों ने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की है और वे राज्य द्वारा प्रस्तुत “दोषपूर्ण रिपोर्ट” से प्रभावित हुए। उन्होंने खंडपीठ से आग्रह किया कि वह आक्षेपित आदेश को संशोधित करे और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे।

प्रतिवादियों का तर्क: निजी प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता श्री देबासिस कर ने तर्क दिया कि पक्षों के बीच “लंबे समय से चल रहा वैवाहिक विवाद” है, जिसके कारण पहले भी कई एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि एकल पीठ ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध वैकल्पिक उपाय का उपयोग करने के लिए कहकर सही निर्णय लिया है।

उन्होंने राधेश्याम एवं अन्य बनाम छवि नाथ एवं अन्य और मोरान एम. बेसेलियोस मारथोमा मैथ्यूज II एवं अन्य बनाम केरल राज्य के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि परमादेश (Mandamus) की रिट सार्वजनिक कर्तव्यों के लिए सार्वजनिक अधिकारियों के खिलाफ जारी की जानी चाहिए, न कि निजी कानून के उपायों के लिए। इसके अलावा, उन्होंने श्रीमती सोनामणि घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के हालिया एकल पीठ के फैसले का भी उल्लेख किया।

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राज्य का पक्ष: विद्वान ए.जी.पी. श्री विमल कुमार शाही ने एक रिपोर्ट दाखिल की जिसमें कहा गया कि वैवाहिक कलह के कारण पक्षकार एक-दूसरे के खिलाफ हैं। उन्होंने बताया कि पहले भी कई पुलिस शिकायतें दर्ज की गई थीं जिन्हें एफआईआर माना गया था और उनमें अंतिम रिपोर्ट (Final Reports) पहले ही सौंपी जा चुकी हैं।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

खंडपीठ ने एफआईआर दर्ज न करने के संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आलोक में रिट याचिका की पोषणीयता (Maintainability) की सावधानीपूर्वक जांच की।

पोषणीयता पर: कोर्ट ने सुधीर भास्करराव तांबे बनाम हेमंत यशवंत धागे एवं अन्य (2016) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008) में निर्धारित कानून को दोहराया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा था:

“यदि किसी व्यक्ति को यह शिकायत है कि पुलिस द्वारा उसकी एफआईआर दर्ज नहीं की गई है… तो पीड़ित व्यक्ति का उपाय भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट जाना नहीं है, बल्कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क करना है।”

ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) और एलेक पदमसी बनाम भारत संघ (2007) के फैसलों पर भरोसा जताते हुए, बेंच ने कहा:

“उपर्युक्त तीन रिपोर्ट किए गए निर्णयों में प्रतिपादित कानून के प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए… हमें यह मानने में कोई संकोच नहीं है कि रिट याचिका बिल्कुल भी पोषणीय नहीं है क्योंकि रिट कोर्ट के समक्ष रिट याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह है कि उसकी लिखित शिकायत को एफआईआर नहीं माना गया है।”

बीएनएसएस की धारा 175 पर: कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 175, विशेष रूप से धारा 175(3) (जो पुराने सीआरपीसी की धारा 156(3) के अनुरूप है) की जांच की, जो मजिस्ट्रेट को शपथ पत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर जांच का आदेश देने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने नोट किया कि एकल पीठ ने व्यावहारिक रूप से याचिकाकर्ता को इसी प्रावधान का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी थी। खंडपीठ ने कहा:

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“हमारे विचार में, विद्वान एकल पीठ द्वारा लिया गया दृष्टिकोण काफी तर्कसंगत है और यह बीएनएसएस की धारा 175 के प्रावधानों के अनुरूप है।”

निर्णय: अपील में कोई गुण-दोष न पाते हुए, खंडपीठ ने अपील और संबंधित आवेदन (CAN 2 of 2025) को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पुष्टि की कि याचिकाकर्ता को अपराध की प्रकृति का आकलन करने और जांच की आवश्यकता सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट से संपर्क करना चाहिए।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: संजना गुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: एम.ए.टी. 1117 ऑफ 2025 (आई.ए. नंबर CAN 2 ऑफ 2025 के साथ)
  • खंडपीठ: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन

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