सुप्रीम कोर्ट ने SASTRA यूनिवर्सिटी को थांजावुर की सरकारी ज़मीन से बेदख़ली पर लगाई रोक, तमिलनाडु सरकार से ‘संवेदनशील’ रुख अपनाने को कहा

 सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें तमिलनाडु के थांजावुर ज़िले में स्थित SASTRA यूनिवर्सिटी को 31.37 एकड़ सरकारी ज़मीन से बेदख़ल करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह इस मामले को “प्रतिष्ठा का प्रश्न” न बनाए और शैक्षणिक संस्थानों के साथ संवेदनशीलता से पेश आए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह तीन वरिष्ठ अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय समिति बनाए, जो SASTRA यूनिवर्सिटी की ओर से दी गई याचिका पर विचार करे और सुनवाई के बाद चार सप्ताह में निर्णय ले।

पीठ ने यह भी कहा कि जब तक समिति इस विषय पर फैसला नहीं लेती, तब तक यूनिवर्सिटी के संचालन में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।

“यह ज़मीन दशकों से एक ऐसी यूनिवर्सिटी द्वारा उपयोग की जा रही है जो सार्वजनिक कार्य कर रही है। राज्य सरकारों को ऐसे संस्थानों के साथ संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए,” कोर्ट ने कहा।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक ज़मीन पर अतिक्रमण को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता, लेकिन यह मामला किसी व्यावसायिक संस्था का नहीं, बल्कि एक कल्याणकारी शैक्षणिक संस्थान का है। कोर्ट ने कहा कि “एक कल्याणकारी राज्य को ऐसे संस्थानों की भूमिका को सार्वजनिक हित की दृष्टि से देखना चाहिए।”

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विवादित 31.37 एकड़ ज़मीन SASTRA यूनिवर्सिटी की अपनी पट्टे की ज़मीन के साथ मिली हुई और उससे सटी हुई है। यूनिवर्सिटी का कहना है कि यह ज़मीन उसके कैंपस का अभिन्न हिस्सा है, जिसमें शैक्षणिक भवन, छात्रावास, उपयोगिता ढांचा और संपर्क मार्ग शामिल हैं।

इस ज़मीन पर बेदख़ली का मुद्दा तब उठा जब 2022 में राज्य सरकार ने यूनिवर्सिटी की ज़मीन के विनिमय या आवंटन से संबंधित सभी प्रस्तुतियों को खारिज कर दिया और 25 फरवरी 2022 को बेदख़ली नोटिस जारी कर दिया।

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SASTRA ने इस नोटिस को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अगस्त और सितंबर 2022 में कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए रिकॉर्ड किया कि विवादित ज़मीन पर क्लासरूम और छात्रावास चल रहे हैं। कोर्ट ने ज़मीन को अपनी निगरानी में लिया, नया निर्माण रोक दिया और छात्रों की पढ़ाई को बाधित न करने का निर्देश दिया।

लेकिन 9 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी की याचिकाएं खारिज करते हुए राज्य सरकार के निर्णय को सही ठहराया और चार सप्ताह में बेदख़ली का निर्देश दिया। इसके खिलाफ SASTRA ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और बताया कि आदेश के अगले ही दिन सरकारी अधिकारी कैंपस में ज़मीन का नियंत्रण लेने पहुंच गए।

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों की भूमिका को देखते हुए ऐसे मामलों में सरकार को कठोरता से नहीं, बल्कि समझदारी से काम लेना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि भूमि पर अतिक्रमण का सामान्य रूप से समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन जब उससे हजारों छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही हो, तब मामला अलग होता है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को याद दिलाया कि वह एक कल्याणकारी सरकार है और उसे छात्रों व संस्थानों के हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही कहा कि इस मामले को “प्रतिष्ठा का प्रश्न” न बनाया जाए।

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तमिलनाडु सरकार को अब चार सप्ताह के भीतर तीन वरिष्ठ अधिकारियों की समिति बनाकर SASTRA की प्रस्तुतियों पर निर्णय लेना होगा। तब तक यूनिवर्सिटी का संचालन निर्बाध रूप से चलता रहेगा।

SASTRA एक प्रमुख निजी ‘डिम्ड यूनिवर्सिटी’ है, जो थांजावुर के तिरुमलाईसमुद्रम में स्थित है और 12,000 से अधिक छात्र यहां विभिन्न संकायों में पढ़ाई कर रहे हैं।

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