पीड़िता बालिग थी और संबंध सहमति से बने थे: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों और धारा 164 CrPC के बयान की अनदेखी पर जताई कड़ी आपत्ति

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण और दुष्कर्म (रेप) के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को दोषमुक्त करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घटना के समय पीड़िता बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से घर छोड़ा था। न्यायालय ने झांसी की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को नजरअंदाज किया और सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के उस बयान की अनदेखी की, जिसमें उसने आरोपी के साथ प्रेम संबंध होने की बात स्वीकार की थी।

न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने भगवत कुशवाहा द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने कुशवाहा को आईपीसी की धारा 366 और 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला झांसी जिले के सकरार थाना क्षेत्र का है। वादी रामस्वरूप ने 28 मई 2015 को एफआईआर दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी रात करीब 3:00 बजे घर से गायब हो गई है और आरोप लगाया कि भगवत कुशवाहा उसे भगा ले गया है।

पुलिस ने 29 मई 2015 को पीड़िता को बरामद किया। विवेचना के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 363, 366, 376, पॉक्सो एक्ट की धारा 4 और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत आरोप पत्र दाखिल किया।

5 सितंबर 2019 को ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी को पॉक्सो एक्ट और एससी/एसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया था, यह मानते हुए कि पीड़िता बालिग (18 वर्ष से अधिक) थी। हालांकि, कोर्ट ने उसे अपहरण और रेप का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट  कृष्ण जन्मभूमि विवाद पर पुनर्विचार करेगा, कानूनी स्थिति पर सारांश प्रस्तुत करने को कहा

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (आरोपी) के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने यह माना है कि पीड़िता बालिग थी, इसके बावजूद उसने उन मेडिकल साक्ष्यों की अनदेखी की जो अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन नहीं करते थे। बचाव पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता और अपीलकर्ता के बीच सहमति से संबंध थे। इसका मुख्य आधार सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया पीड़िता का बयान था, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी क्योंकि वह उससे प्रेम करती थी।

वहीं, राज्य सरकार और वादी के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और सबूतों के उचित मूल्यांकन पर आधारित था।

कोर्ट का विश्लेषण

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले के सबूतों, विशेष रूप से पीड़िता (PW-3) की गवाही, धारा 164 के बयान और मेडिकल रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया।

उम्र और सहमति पर: हाईकोर्ट ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पीड़िता को बालिग (18 वर्ष से ऊपर) मानने के निष्कर्ष को चुनौती नहीं दी गई है। चूंकि पीड़िता बालिग थी, इसलिए कोर्ट ने यह जांचा कि क्या वास्तव में उसका अपहरण और रेप हुआ था।

कोर्ट ने पीड़िता की गवाही में गंभीर विरोधाभास पाया। जहां कोर्ट में गवाही देते समय उसने जबरन अपहरण और रेप का आरोप लगाया, वहीं धारा 164 के बयान में उसने बिल्कुल अलग कहानी बताई थी।

कोर्ट ने आदेश में कहा:

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 फरवरी को अहम मामलों की सुनवाई की

“पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिए गए अपने बयान में कहा है कि वह अपीलकर्ता से प्यार करती थी और अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि जिरह (cross-examination) में पीड़िता ने स्वीकार किया कि उसने मजिस्ट्रेट को रेप या जबरन ले जाने के बारे में नहीं बताया था।

मेडिकल साक्ष्य: कोर्ट ने 30 मई 2015 को हुए मेडिकल परीक्षण का हवाला दिया, जिसमें पीड़िता के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी और डॉक्टर को हालिया यौन संबंध के कोई सबूत नहीं मिले थे।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कड़ी आलोचना की, जिसने घटना की तारीख को गलत पढ़कर मेडिकल साक्ष्यों को खारिज कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने माना था कि घटना 25 मई को हुई, जबकि एफआईआर और सबूतों के अनुसार घटना 28 मई की थी।

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“निचली अदालत का यह निष्कर्ष, जिसके आधार पर मेडिकल रिपोर्ट और स्लाइड रिपोर्ट को खारिज किया गया, विकृत (perverse) और निंदनीय है। यह अपीलकर्ता के पक्ष में मौजूद सबूतों को छिपाने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास प्रतीत होता है…”

सबूत का भार (Burden of Proof): सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि यद्यपि केवल पीड़िता की गवाही पर सजा दी जा सकती है, लेकिन ऐसी गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय होनी चाहिए।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

READ ALSO  निर्माण श्रमिकों को अपूर्ण भत्ता भुगतान पर सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की आलोचना की

“कोर्ट के समक्ष पीड़िता की गवाही, धारा 164 सीआरपीसी के तहत उसके बयान और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर, यह सुरक्षित रूप से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पीड़िता और अपीलकर्ता के बीच संबंध थे और पीड़िता 28.05.2015 को अपनी मर्जी से अपने पिता का घर छोड़कर गई थी। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पीड़िता को उसकी इच्छा के विरुद्ध या उसकी सहमति के बिना ले जाया गया था।”

फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों को समग्रता में नहीं देखा और मेडिकल सबूतों व पीड़िता के पिछले बयानों की अनदेखी करके गंभीर त्रुटि की है।

नतीजतन, कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और 5 सितंबर 2019 के दोषसिद्धि आदेश तथा सजा को रद्द कर दिया। अपीलकर्ता भगवत कुशवाहा को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

केस टाइटल: भगवत कुशवाहा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 452 ऑफ 2021

कोरम: न्यायमूर्ति अचल सचदेव

अपीलकर्ता के वकील: अभिषेक मयंक, अभिषेक श्रीवास्तव, अरबाज दानिश, विपिन कुमार, जिया नाज जैदी

प्रतिवादी के वकील: जी.ए., राजेश कुमार सिंह, विनय कुमार सिंह

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles