पत्नी का पति के साथ रहने से इनकार भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं; कमाने की क्षमता गुजारा भत्ता न देने का कारण नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि केवल दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) की डिक्री के बावजूद पति के साथ रहने से इनकार करना, पत्नी को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के तहत भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी की शैक्षिक योग्यता या उसकी “कमाने की क्षमता” उसे उसके वैधानिक अधिकार से वंचित करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से इसलिए मना कर दिया गया था क्योंकि वह कथित तौर पर बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही थी और अपनी आजीविका कमाने में सक्षम थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) याचिकाकर्ता पत्नी और उसके नाबालिग बेटे द्वारा प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, बुलंदशहर के 3 अक्टूबर 2024 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।

पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी के भरण-पोषण के आवेदन को खारिज कर दिया था, जबकि पति (विपक्षी संख्या 2) को उनके नाबालिग बेटे के भरण-पोषण के लिए केवल 3,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया था। पत्नी ने अपने लिए 15,000 रुपये और बेटे के लिए 10,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण की मांग की थी।

याचिकाकर्ता पत्नी के अनुसार, उसे 2015 में और फिर जनवरी 2020 में दहेज की मांग और क्रूरता के कारण ससुराल से निकाल दिया गया था। उसका कहना था कि उसकी आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर है। हालांकि, पारिवारिक न्यायालय ने यह तर्क देते हुए उसका दावा खारिज कर दिया था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 (दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना) के तहत पति द्वारा दायर मुकदमे के बावजूद उसने ससुराल लौटने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने यह भी माना था कि पत्नी ने अपनी पेशेवर शिक्षा (एम.ए. और आईटीआई डिप्लोमा) को छिपाया था और वह स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पारिवारिक न्यायालय का यह निष्कर्ष गलत है कि वह बिना किसी उचित कारण के अलग रह रही है। उन्होंने कहा कि उसे क्रूरता और उत्पीड़न के कारण घर छोड़ने पर मजबूर किया गया था। वकील ने जोर देकर कहा कि पति, जो एक क्लास-IV कर्मचारी है और लगभग 48,350 रुपये प्रति माह (सकल वेतन) कमाता है, यह साबित करने में विफल रहा है कि पत्नी लाभकारी रोजगार में है।

इसके विपरीत, पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी ने 2007 में अपनी मर्जी से ससुराल छोड़ दिया था। पति ने नाबालिग बेटे के पितृत्व से भी इनकार किया और दावा किया कि 2007 के बाद से उनके बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं थे। पति का तर्क था कि पत्नी उच्च शिक्षित है, उसके पास एम.ए. की डिग्री और सिलाई में आईटीआई डिप्लोमा है, और वह शिक्षण व ट्यूशन के माध्यम से पैसा कमा रही है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

धारा 125(4) सीआरपीसी और दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना

हाईकोर्ट ने पाया कि पारिवारिक न्यायालय ने केवल इस आधार पर पत्नी को धारा 125(4) के तहत अयोग्य ठहराकर गलती की है कि उसने डिक्री के बावजूद पति के साथ रहने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले रीना कुमारी उर्फ रीना देवी बनाम दिनेश कुमार महतो (2025) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की डिक्री पारित होने के बावजूद पत्नी का ससुराल से दूर रहने का निर्णय, उसके खिलाफ धारा 125(4) सीआरपीसी के तहत अयोग्यता के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि पति द्वारा बच्चे के पितृत्व से इनकार करना क्रूरता के समान है, जो पत्नी के अलग रहने के निर्णय को सही ठहराता है। कोर्ट ने कहा, “विपक्षी संख्या 2 (पति) द्वारा नाबालिग बच्चे का पिता होने से इनकार करना संभवतः वह अंतिम कारण (Last Straw) रहा होगा, जिसने ससुराल में दुर्व्यवहार के कारण उसकी पीड़ा को और बढ़ा दिया।”

पत्नी की कमाने की क्षमता पर

कोर्ट ने पति की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि पत्नी शिक्षित होने के कारण भरण-पोषण की हकदार नहीं है। सुनीता कछवाह और अन्य बनाम अनिल कछवाह (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि केवल इसलिए कि पत्नी योग्य है, यह मानने के लिए पर्याप्त नहीं है कि वह अपना भरण-पोषण करने की स्थिति में है।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने कहा:

“केवल यह तथ्य कि वह पोस्ट-ग्रेजुएट है और उसने सिलाई में आईटीआई डिप्लोमा किया है, अपने आप में इस निष्कर्ष पर नहीं ले जा सकता कि याचिकाकर्ता पत्नी लाभकारी कार्य कर रही है। यह एक सामाजिक वास्तविकता है कि महिलाएं खुद को घरेलू जिम्मेदारियों और बच्चों की देखभाल के लिए समर्पित कर देती हैं और लाभकारी रोजगार पाने में असमर्थ होती हैं।”

कोर्ट ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पत्नी की योग्यता का सहारा लेने को “अनुचित” बताया और कहा कि ऐसी धारणाएं उन सामाजिक और भावनात्मक वास्तविकताओं के प्रति असंवेदनशील हैं जिनका सामना महिलाएं करती हैं।

भरण-पोषण की राशि पर

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कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा किशोर बेटे के लिए 3,000 रुपये की “मामूली राशि” तय करने की आलोचना की। कोर्ट ने पति के सकल वेतन से ऋण पुनर्भुगतान (35,124 रुपये) की कटौती करके कम शुद्ध आय दिखाने की अनुमति देने के लिए भी निचली अदालत को गलत ठहराया। रजनेश बनाम नेहा (2021) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण आदर्श रूप से शुद्ध वेतन का 25% होना चाहिए, और पत्नी की कमाने की क्षमता का मामला खड़ा करके वैधानिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए 3 अक्टूबर 2024 के आदेश को रद्द कर दिया। मामले को नए सिरे से भरण-पोषण निर्धारण के लिए पारिवारिक न्यायालय, बुलंदशहर को वापस भेज दिया गया।

कोर्ट ने निर्देश दिया:

“तदनुसार यह माना जाता है कि याचिकाकर्ता संख्या 1/पत्नी और नाबालिग बेटा दोनों विपक्षी संख्या 2 से भरण-पोषण पाने के समान रूप से हकदार हैं और वह अपनी पत्नी और नाबालिग बेटे दोनों का भरण-पोषण करने के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी है।”

पारिवारिक न्यायालय को एक महीने के भीतर नया और तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती सुमन वर्मा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन नंबर 5971 ऑफ 2024
  • पीठ: न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद

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