दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, न कि किशोरों के बीच आपसी सहमति से बने रोमांटिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में लाना। जस्टिस विकास महाजन की पीठ ने मामले में टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया यह मामला “मासूमियत की उम्र” (Age of Innocence) में बने प्रेम प्रसंग का प्रतीत होता है। इसके साथ ही, कोर्ट ने ट्रायल में हो रही देरी पर चिंता जताते हुए 19 वर्षीय आरोपी को जमानत दे दी।
मामले की पृष्ठभूमि
आरोपी (याचिकाकर्ता) ने एफआईआर संख्या 495/2023 के संबंध में नियमित जमानत की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह एफआईआर पीड़िता की मां की शिकायत पर बुध विहार पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उनकी नाबालिग बेटी का 26 नवंबर, 2023 को अपहरण कर लिया गया था। बाद में पीड़िता को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से बरामद किया गया।
बरामदगी के बाद सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी उसे उसकी मर्जी के खिलाफ पश्चिम बंगाल ले गया, जहां उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए, जिससे वह गर्भवती हो गई। पीड़िता ने यह भी कहा कि आरोपी ने उससे शादी कर ली थी। पुलिस ने मामले में आईपीसी की धारा 376 (दुष्कर्म), 363 (अपहरण), 344, 506 और पोक्सो एक्ट की धारा 6 व 21 के तहत आरोप लगाए थे।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील माधव सूरी ने कोर्ट को बताया कि आरोपी और पीड़िता के बीच प्रेम प्रसंग था। गिरफ्तारी के समय आरोपी की उम्र 19 वर्ष थी, जबकि पीड़िता 17 वर्ष की थी। बचाव पक्ष का तर्क था कि दोनों ने परिवारों की जानकारी और सहमति से विवाह किया था और कोलकाता में आपसी सहमति से पति-पत्नी की तरह रह रहे थे।
वकील ने ट्रायल में हो रही देरी का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने कहा कि आरोपी 7 फरवरी, 2024 से हिरासत में है। पीड़िता का मुख्य परीक्षण (Examination-in-chief) 30 नवंबर, 2024 को आंशिक रूप से हुआ था, लेकिन इसके बाद कई तारीखें बीत जाने के बावजूद गवाही पूरी नहीं हो सकी है, जिसके लिए आरोपी जिम्मेदार नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश एपीपी (APP) अजय विक्रम सिंह ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और अपराध में आरोपी के माता-पिता ने भी सहयोग किया था।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण
जस्टिस विकास महाजन ने चार्जशीट और तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पीड़िता पहले भी सितंबर 2023 में घर से लापता हुई थी और सुरक्षित वापस आ गई थी। वर्तमान घटना के संदर्भ में कोर्ट ने देखा कि जब पीड़िता अपनी मां के साथ बस स्टैंड पर थी, तो वह अचानक दौड़कर एक बस में चढ़ गई और अपनी मां को वहीं छोड़ दिया। कोर्ट ने कहा:
“जिस तरह से पीड़िता अपनी मां को बस स्टैंड पर छोड़कर स्वेच्छा से भागी और बस में चढ़ गई, यह घटना प्रथम दृष्टया यह सुझाव देती है कि उसने अपनी मर्जी से घर छोड़ा और बाद में याचिकाकर्ता के साथ शामिल हो गई।”
कोर्ट ने माना कि हालांकि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन उसमें “पर्याप्त परिपक्वता और बौद्धिक क्षमता” (Sufficient maturity and intellectual capacity) दिखाई देती है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का यह कहना नहीं है कि पीड़िता को बंधक बनाकर रखा गया था या उसके पास भागने का कोई मौका नहीं था।
कोर्ट ने अजय कुमार बनाम राज्य मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि पोक्सो एक्ट का इरादा कभी भी युवाओं के बीच सहमति से बने रोमांटिक संबंधों को अपराधी बनाना नहीं था। साथ ही, धर्मेंद्र सिंह बनाम राज्य के फैसले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय आरोपी और पीड़िता की उम्र और उनके संबंधों की प्रकृति को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ट्रायल में देरी पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। आदेश में ट्रायल कोर्ट की ऑर्डर शीट्स का हवाला देते हुए नोट किया गया कि जांच अधिकारी (IO) की अनुपलब्धता या पीड़िता की बीमारी के कारण गवाही बार-बार टल रही थी। कोर्ट ने कहा:
“स्पष्ट रूप से, पीड़िता के आंशिक मुख्य परीक्षण को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और उसके बाद उन कारणों से गवाही पूरी नहीं हो सकी जो याचिकाकर्ता के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। विलंबित ट्रायल के कारण याचिकाकर्ता जेल में बंद है।”
फैसला
मामले की परिस्थितियों, दोनों पक्षों की उम्र, प्रेम प्रसंग की संभावना और ट्रायल की धीमी गति को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को नियमित जमानत दे दी। कोर्ट ने आरोपी को 10,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि की जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया। साथ ही शर्त लगाई कि वह पीड़िता या गवाहों से संपर्क नहीं करेगा।

