कोर्ट वकील को बचाव पक्ष के दस्तावेजों का ‘स्रोत’ बताने के लिए बाध्य नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि कोई भी रिविजनल कोर्ट किसी पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों को यह बताने के लिए बाध्य नहीं कर सकता कि उन्होंने न्यायिक रिकॉर्ड में लगाए गए दस्तावेज कहां से प्राप्त किए हैं। कोर्ट ने माना कि ऐसी जानकारी भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 126 के तहत अटॉर्नी-क्लाइंट विशेषाधिकार (Attorney-Client Privilege) द्वारा सुरक्षित है।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने मैकडॉनल्ड्स इंडिया प्रा. लि. की याचिका को स्वीकार करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कंपनी के वकीलों को कार्यवाही के दौरान दायर कुछ आवेदनों के स्रोत का खुलासा करने का निर्देश दिया गया था।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद प्रतिवादी संख्या 2, दीपक खोसला द्वारा मैकडॉनल्ड्स इंडिया और अन्य के खिलाफ दायर एक आपराधिक शिकायत (Deepak Khosla v. Connaught Plaza Restaurants (P) Ltd.) से उत्पन्न हुआ था। 20 फरवरी 2017 को, अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (ACMM) ने याचिकाकर्ता (मैकडॉनल्ड्स) के परिसर में तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) का निर्देश दिया था।

मैकडॉनल्ड्स इंडिया ने इस आदेश को ASJ के समक्ष आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) के माध्यम से चुनौती दी। तलाशी वारंट में किसी भी तरह की जल्दबाजी की आवश्यकता न होने की बात साबित करने के लिए, याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता द्वारा 2011 में एक अलग कार्यवाही में दायर किए गए दो आवेदनों की प्रतियां कोर्ट में पेश कीं। इसके आधार पर, 4 मार्च 2017 को ASJ ने तलाशी और जब्ती के निर्देशों पर एकतरफा रोक लगा दी।

इसके बाद, शिकायतकर्ता दीपक खोसला ने धारा 340 Cr.P.C. के तहत एक आवेदन दायर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि 2011 के आवेदन सुनवाई के समय ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं थे। उनका कहना था कि ये दस्तावेज “चोरी-छिपे रिकॉर्ड पर रखे गए या अवैध तरीकों से प्राप्त किए गए,” और संभवतः पुलिस या अदालती रिकॉर्ड से लीक हुए हैं, जो धोखाधड़ी और झूठी गवाही के समान है।

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इस पर कार्रवाई करते हुए, ASJ ने 20 मई 2017 को आक्षेपित आदेश पारित किया, जिसमें मैकडॉनल्ड्स इंडिया के वकीलों को व्यक्तिगत हलफनामा दायर कर यह बताने का निर्देश दिया गया कि उन्होंने उक्त आवेदनों की प्रतियां कब और कहां से (स्रोत) प्राप्त कीं।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता (मैकडॉनल्ड्स) ने तर्क दिया कि यह निर्देश भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 126 का उल्लंघन करता है, जो कानूनी पेशेवरों को रोजगार के दौरान किए गए किसी भी संचार का खुलासा करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि यह विशेषाधिकार मुवक्किल (Client) का है और उनकी स्पष्ट सहमति के बिना इसे हटाया नहीं जा सकता। इसके अलावा, उन्होंने स्पष्ट किया कि दस्तावेज उनके पास वैध रूप से थे, क्योंकि उन्हें 2013 में कंपनी लॉ बोर्ड (CLB) के समक्ष कार्यवाही के दौरान ये दस्तावेज प्राप्त हुए थे।

विपक्ष में, प्रतिवादी संख्या 2 ने तर्क दिया कि धारा 126 IEA एक बिना शर्त रोक नहीं है। धारा 126 के परंतुक (Provisos) का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि यदि कोई संचार किसी अवैध उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए किया गया है या अपराध/धोखाधड़ी को दर्शाता है, तो उसे सुरक्षा नहीं मिलती। उन्होंने Donald Weston v. Pearey Mohan Dass मामले का हवाला देते हुए कहा कि “अदालत के खिलाफ कोई विशेषाधिकार नहीं है” और वकीलों को दस्तावेजों के स्रोत के लिए जवाबदेह होना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने धारा 126 IEA के दायरे की जांच करते हुए कहा कि न्याय के उचित प्रशासन को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि एक व्यक्ति अपने वकील से विश्वास के साथ परामर्श कर सके और यह विश्वास अटूट होना चाहिए।

कोर्ट ने Superintendent and Remembrancer of Legal Affairs v. Satyen Bhowmick (1981) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें यह माना गया था कि जहां किसी दस्तावेज की सामग्री विशेषाधिकार प्राप्त है, वहां वकील के खिलाफ इसका खुलासा करने से इनकार करने पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

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“जब कोई मुवक्किल कानूनी बचाव के उद्देश्य से अपने वकील को कोई दस्तावेज सौंपता है, तो दस्तावेज सौंपने का कार्य और उस दस्तावेज की उत्पत्ति (Origin) के बारे में जानकारी पेशेवर गोपनीयता का हिस्सा होती है। कोर्ट में दायर दस्तावेजों की प्राथमिक जिम्मेदारी पक्षकार यानी मुवक्किल की होती है। वकील को यह बताने के लिए मजबूर करना कि ‘मुवक्किल X ने मुझे यह दस्तावेज दिया’, धारा 126 IEA के तहत संरक्षित दस्तावेजों के ‘स्रोत’ का खुलासा करने के लिए मजबूर करना है।”

प्रतिवादी के “धोखाधड़ी” वाले तर्क को खारिज करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 126 के अपवाद को लागू करने के लिए, प्रथम दृष्टया (Prima Facie) ऐसी सामग्री होनी चाहिए जो यह सुझाव दे कि संचार अवैध उद्देश्य के लिए था। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने एक उचित स्पष्टीकरण दिया था कि उन्हें 2013 में कंपनी लॉ बोर्ड की कार्यवाही के दौरान दस्तावेज मिले थे, जिससे चोरी या अवैध प्राप्ति के आरोप खारिज हो जाते हैं।

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परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 मई 2017 के आदेश और वकीलों के खिलाफ अवमानना/अनुपालन न करने के नोटिस सहित सभी परिणामी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: मैकडॉनल्ड्स इंडिया लि. बनाम स्टेट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली
  • केस नंबर: W.P.(CRL) 2294/2017
  • कोरम: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
  • याचिकाकर्ता के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिद्धार्थ अग्रवाल, अधिवक्ता सुश्री स्तुति गुजराल, श्री विश्वजीत सिंह भाटी, श्री तस्नीमुल हसन, सुश्री प्रीति वर्मा, श्री विपिन कुमार।
  • प्रतिवादी के वकील: श्री अमोल सिन्हा (एएससी, स्टेट); प्रतिवादी संख्या 2 व्यक्तिगत रूप से (दीपक खोसला)।

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