“बेजुबानों की आवाज”: गया कोर्ट ने जब्त मवेशियों को छोड़ने से किया इनकार, निजी गौशालाओं की जांच के दिए आदेश

गया: “बेजुबानों की आवाज” (Voicing for Voiceless) के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए, गया के जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-IX की अदालत ने जब्त मवेशियों की रिहाई की मांग वाली एक आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान मवेशियों को उनके मालिक को सौंपने पर वैधानिक रोक है।

पीठासीन न्यायाधीश श्री अजीत कुमार सिंह ने अपने फैसले में पुलिस और निजी गौशालाओं सहित विभिन्न हितधारकों द्वारा पशु कल्याण नियमों के “चुनिंदा अनुपालन” (Selective Compliance) पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने गया जिले में निजी संस्थाओं की हिरासत में रखे गए सभी जब्त मवेशियों की स्थिति की व्यापक जांच का आदेश दिया है। इसके साथ ही, यह देखते हुए कि लंबी कानूनी प्रक्रिया जानवरों के लिए अनावश्यक पीड़ा का कारण बनती है, अदालत ने निचली अदालत को इस मामले में एक महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला वजीरगंज थाना कांड संख्या 539/2025 से संबंधित है। पुलिस ने 11 अगस्त, 2025 को एक कंटेनर ट्रक से 68 मवेशियों (47 भैंस और 21 पाड़ा) को जब्त किया था, जिन्हें कथित तौर पर अमानवीय परिस्थितियों में ले जाया जा रहा था। जब्ती के बाद, जांच अधिकारी (IO) ने मवेशियों की कस्टडी ‘वृषभनाथ फाउंडेशन चैरिटेबल ट्रस्ट’, बोधगया को सौंप दी थी।

याचिकाकर्ता आस मोहम्मद ने खुद को मवेशियों का असली मालिक बताते हुए उनकी रिहाई के लिए याचिका दायर की। उनका तर्क था कि उन्होंने शेरघाटी मवेशी मेले से इन जानवरों को खरीदा था और वे उनके भरण-पोषण का खर्च उठाने को तैयार हैं।

न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, गया ने 16 सितंबर, 2025 को पशु क्रूरता निवारण (केस संपत्ति जानवरों की देखभाल और रखरखाव) नियम, 2017 का हवाला देते हुए रिहाई की याचिका खारिज कर दी थी। इसी आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने सत्र न्यायालय में रिविजन याचिका दायर की थी।

READ ALSO  धारा 202 सीआरपीसी और 138 एनआई एक्ट: शिकायत, हलफनामे और दस्तावेजों पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट एक अभियुक्त को समन कर सकता है-हाईकोर्ट

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील मो. कैसर सरफुद्दीन ने तर्क दिया कि पुलिस ने रिहाई पर कोई आपत्ति नहीं जताई है, बशर्ते रखरखाव का खर्च दिया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि वृषभनाथ फाउंडेशन के पास मवेशियों को रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और न ही पर्याप्त बुनियादी ढांचा है, जिसके कारण कई जानवरों की मौत हो चुकी है। यह भी दलील दी गई कि फाउंडेशन और जांच अधिकारी की मिलीभगत है और फाउंडेशन केवल जब्ती (forfeiture) का लाभ लेने के लिए कस्टडी रख रहा है।

दूसरी ओर, जिला अभियोजन अधिकारी (D.P.O.) श्री कुमार विश्वरंजन और फाउंडेशन के वकील श्री शशांक धर शेखर ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने 2017 के नियमों के नियम 8 का हवाला देते हुए कहा कि कानून मुकदमे के लंबित रहने के दौरान मालिक को मवेशी सौंपने से स्पष्ट रूप से रोकता है। फाउंडेशन ने अपनी नेकी साबित करने के लिए कहा कि वह एक धर्मार्थ संस्था है और रखरखाव के खर्च का दावा नहीं करेगा।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

मवेशियों की रिहाई पर: अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि 2017 के नियमों के नियम 8 के तहत एक स्पष्ट “विधायी रोक” है। अदालत ने कहा, “मुकदमे के लंबित रहने के दौरान मवेशियों को रिविजनकर्ता के पक्ष में नहीं छोड़ा जा सकता। यह केवल तभी आरोपी को वापस किया जा सकता है, जब वह सभी आरोपों से बरी हो जाए।”

नियमों की अनदेखी और गंभीर लापरवाही: याचिका खारिज करते हुए अदालत ने सिस्टम की खामियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। न्यायाधीश ने कहा कि जानवरों की पहचान और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है:

  1. नियम 3 का उल्लंघन: अदालत ने पाया कि मवेशियों को सौंपने से पहले पुलिस ने न तो उनका स्वास्थ्य निरीक्षण कराया और न ही उनकी टैगिंग (Tagging) की, जो नियम 3(a) के तहत अनिवार्य है। इसके अलावा, बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के ही मवेशियों को फाउंडेशन को सौंप दिया गया, जो नियम 3(b) का उल्लंघन है।
  2. फाउंडेशन का आचरण: अदालत ने इस बात पर हैरानी जताई कि फाउंडेशन ने बिना कोर्ट या पुलिस को सूचित किए जब्त मवेशियों को बोधगया से 250 किलोमीटर दूर बांका शिफ्ट कर दिया। अदालत ने इसे “चौंकाने वाली और गंभीर स्थिति” करार दिया।
  3. निजी गौशालाओं की भूमिका: अदालत ने टिप्पणी की कि निजी संस्थाएं अक्सर धर्मार्थ उद्देश्यों के बजाय केवल मवेशियों को जब्त (Forfeit) कराने के लिए रिहाई का विरोध करती हैं।
READ ALSO  "चुनाव से पहले कितने लोगों को जेल होगी?" सुप्रीम कोर्ट ने एमके स्टालिन के खिलाफ टिप्पणी पर यूट्यूबर को दी गई जमानत बहाल की

सरकारी जिम्मेदारी: अदालत ने जोर देकर कहा कि जब्त जानवरों की कस्टडी प्राथमिक रूप से सरकारी गौशालाओं या ‘पशु क्रूरता निवारण सोसाइटी’ (SPCA) को दी जानी चाहिए। निजी हाथों में बिना निगरानी के कस्टडी देने से “अनुचित लाभ” (Unjust enrichment) की संभावना बढ़ती है और सरकार को नुकसान होता है।

त्वरित सुनवाई की आवश्यकता: अदालत ने सवाल उठाया कि जिस अपराध में पहली बार के लिए अधिकतम सजा केवल 50 रुपये का जुर्माना है, उसकी जांच और सुनवाई अनिश्चित काल तक क्यों चलनी चाहिए। अदालत ने कहा कि लंबी मुकदमेबाजी से “बेजुबान मवेशियों” को और अधिक पीड़ा होती है, जो अधिनियम के उद्देश्य को विफल करती है।

फैसला और निर्देश

अदालत ने क्रिमिनल रिविजन नंबर 110/2025 को खारिज कर दिया, लेकिन अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:

  1. समय सीमा: निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि इस आदेश की प्राप्ति के एक महीने के भीतर मुकदमे (Trial) को पूरा किया जाए।
  2. जांच का आदेश: अदालत ने एक विविध मामला (Miscellaneous case) दर्ज करने का निर्देश दिया। D.P.O. को गया जिले में इसी तरह के मामलों में जब्त किए गए सभी मवेशियों की स्थिति पर जांच रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। जांच में यह देखा जाएगा कि कितने जानवर जीवित हैं, मृत जानवरों का पोस्टमार्टम हुआ या नहीं, और क्या जब्त (Forfeited) जानवरों को नियम 9(6) के अनुसार गोद (Adoption) दिया गया है।
  3. उच्च अधिकारियों को नोटिस: अदालत ने आदेश की प्रतियां भारतीय जीव जंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष, बिहार के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश दिया, ताकि वे इन मुद्दों का संज्ञान लें और जब्त जानवरों के लिए सरकारी बुनियादी ढांचे का निर्माण सुनिश्चित करें।
READ ALSO  हत्या के प्रयास में महिला को पांच साल की सश्रम कारावास की सजा

न्यायाधीश ने निष्कर्ष निकाला कि यह आदेश यह सुनिश्चित करने के लिए पारित किया गया है कि “बेजुबानों की आवाज सुनी जाए” और किसी भी स्तर पर अधिकारों के दुरुपयोग को रोका जा सके।

केस विवरण

  • केस टाइटल: आस मोहम्मद बनाम बिहार राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन नंबर 110/2025 (S.J.)
  • अदालत: जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-IX, गया
  • पीठासीन न्यायाधीश: श्री अजीत कुमार सिंह
  • संबंधित अधिनियम: पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960; पशु क्रूरता निवारण (केस संपत्ति जानवरों की देखभाल और रखरखाव) नियम, 2017

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles