नाबालिग और सामूहिक दुष्कर्म के आरोपों में ‘सहमति से संबंध’ की दलील कानूनन अमान्य: सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो मामले में आरोपी की जमानत रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने एक नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आरोपी को जमानत देने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपराध की जघन्य प्रकृति और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की वैधानिक कठोरता पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जहां आरोपों में कई अपराधी, जबरदस्ती और एक नाबालिग पीड़िता शामिल हो, वहां “सहमति से संबंध” (Consensual Relationship) की दलील “कानूनन पूरी तरह से अमान्य” है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील पीड़िता द्वारा दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट के 9 अप्रैल, 2025 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने इस फैसले के तहत प्रतिवादी संख्या 2 (अर्जुन) को जमानत दी थी। यह मामला उत्तर प्रदेश के शामली जिले के थाना कांधला में दर्ज एफआईआर संख्या 426/2024 से संबंधित है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, लगभग 14 वर्षीय पीड़िता (जन्म तिथि: 18.07.2010) ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे देसी कट्टे से डराकर और कृत्यों की वीडियो रिकॉर्डिंग करके बार-बार उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया कि 1 दिसंबर, 2024 को आरोपी और उसके साथी ने पीड़िता का अपहरण किया, उससे छेड़छाड़ की और उसे छोड़ दिया।

पुलिस ने 2 दिसंबर, 2024 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 65(1), 74, 137(2) और 352 तथा पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 5(1), 6, 9(जी) और 10 के तहत एफआईआर दर्ज की। 19 फरवरी, 2025 को चार्जशीट दायर की गई। इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दे दी, जिसके खिलाफ पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (पीड़िता) के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज किया, जिसमें “नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म और यौन हमले की रिकॉर्डिंग व उसे वायरल करने की धमकी” शामिल थी। यह भी कहा गया कि आरोपी ने जमानत सुनवाई से पहले चार्जशीट दायर होने के तथ्य को छुपाया था। वकील ने बीएनएसएस की धारा 183 (सीआरपीसी की धारा 164 के अनुरूप) के तहत दर्ज पीड़िता के बयान पर प्रकाश डाला, जिसमें उसने हमले और धमकियों का विवरण दिया था।

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उत्तर प्रदेश राज्य ने अपील का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि पीड़िता के नाबालिग होने के निर्विवाद तथ्य को देखते हुए, “सहमति, यदि कोई हो, तो वह कानूनी रूप से अप्रासंगिक है।” राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ यूपी बनाम सोनू कुशवाह और रामजी लाल बैरवा बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पॉक्सो अपराधों को निजी विवाद नहीं माना जा सकता।

इसके विपरीत, आरोपी के वकील ने दावा किया कि पीड़िता के परिवार द्वारा उनके संबंधों को अस्वीकार करने के कारण उसे झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में अस्पष्ट देरी और पुलिस व मजिस्ट्रेट के समक्ष पीड़िता के बयानों में विरोधाभास का तर्क दिया। यह भी कहा गया कि मेडिकल जांच में कोई चोट नहीं मिली और 18 वर्षीय आरोपी को जेल में रखने से उसके भविष्य को नुकसान होगा।

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कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हाईकोर्ट के तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि मामले में सामूहिक दुष्कर्म और डराने-धमकाने के विशिष्ट आरोप शामिल हैं।

बचाव पक्ष की दलील पर कोर्ट ने कहा:

“प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से दी गई ‘सहमति से संबंध’ की दलील कानूनन पूरी तरह से अमान्य है, विशेष रूप से जहां आरोप एक से अधिक आरोपियों तक विस्तारित हों और इसमें जबरदस्ती, धमकी और कई अपराधी शामिल हों।”

पीठ ने नोट किया कि हालांकि चार्जशीट दाखिल होने से जमानत अपने आप नहीं रुकती, लेकिन हाईकोर्ट ने “अपराध की प्रकृति और गंभीरता तथा जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री” पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कथित आचरण का “पीड़िता के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है और यह समाज की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यात्मक सहसंबंध के बिना सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई और मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय के फैसलों पर भरोसा करने के लिए हाईकोर्ट की आलोचना की। पीठ ने स्पष्ट किया कि मनीष सिसोदिया का मामला लंबी कैद और देरी के विशिष्ट तथ्यों पर आधारित था, जबकि मौजूदा मामले में आरोपी केवल कुछ महीनों से हिरासत में था।

भगवान सिंह बनाम दिलीप कुमार और बिहार राज्य बनाम राजवल्लभ प्रसाद का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि गंभीर यौन अपराधों में पीड़िता की सुरक्षा और गवाहों को डराने-धमकाने की संभावना सर्वोपरि है। कोर्ट ने पीड़िता और आरोपी के एक ही गांव में रहने और पीड़िता की मनोवैज्ञानिक पीड़ा का संज्ञान लेते हुए कहा:

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“प्रतिवादी संख्या 2 की रिहाई के बाद उसकी उपस्थिति से पीड़िता को डराने-धमकाने और और अधिक आघात पहुंचाने की वास्तविक और आसन्न आशंका उत्पन्न होती है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा:

“हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत सामग्री के गलत निर्देशन और प्रासंगिक कारकों पर विचार न करने से दूषित है, जो इसे स्पष्ट रूप से विकृत बनाता है।”

कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 2 को दी गई जमानत रद्द कर दी और उसे दो सप्ताह के भीतर संबंधित न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। ट्रायल कोर्ट को मामले को प्राथमिकता देने और मुकदमे को शीघ्रता से समाप्त करने का निर्देश दिया गया।

केस डीटेल्स:

  • केस का नाम: एक्स (X) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 164 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन

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