“गरीबी कोई अपराध नहीं”: राजस्थान हाईकोर्ट ने पारोल शर्तों में भेदभाव रोकने के लिए जारी की नई गाइडलाइंस

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पारोल की शर्तें तय करते समय कैदी की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जाना चाहिए और गरीब कैदियों से ज़मानतदारी की मांग करना उनके साथ भेदभाव के समान है। कोर्ट ने साफ किया कि पारोल कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि एक सुधारात्मक अधिकार है, जो सिर्फ अमीरों तक सीमित नहीं रह सकता।

न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति फर्जन्द अली की खंडपीठ ने यह फैसला 6 जनवरी को सुनाया। कोर्ट ने यह आदेश हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे खारतराम की याचिका पर दिया, जिसे उसने जेल से पोस्टकार्ड भेजकर कोर्ट से गुहार लगाते हुए लिखा था कि वह ज़मानतदार नहीं दे सकता।

खारतराम 2014 से जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद है और उसे इससे पहले भी तीन बार नियमित पारोल मिल चुका है। हर बार कोर्ट ने ज़मानतदार की शर्त हटाकर केवल निजी मुचलके पर रिहाई का आदेश दिया था। चौथी बार 29 सितंबर 2025 को जिला पारोल समिति ने 40 दिन की नियमित पारोल तो मंज़ूर की, लेकिन दो ₹25,000 की ज़मानतदारियों की शर्त जोड़ दी। खारतराम इस शर्त को पूरा नहीं कर सका और वकील भी नहीं रख सका, इसलिए उसने पोस्टकार्ड भेजकर हाईकोर्ट से राहत की मांग की।

कोर्ट ने इस बार समिति के फिर से वही शर्त लगाने को लेकर तीखी टिप्पणी की और कहा:

“यह संस्थागत उपेक्षा को दर्शाता है। पारोल एक सुधारात्मक अधिकार है, इसे अमीर और गरीब के बीच भेदभाव का जरिया नहीं बनाया जा सकता। यदि कोई कैदी गरीब है और ज़मानतदार नहीं दे सकता, तो उससे ज़मानतदार मांगना पारोल से इनकार करने के समान है।”

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कोर्ट ने खारतराम को ₹50,000 के निजी मुचलके पर रिहा करते हुए राज्य भर में लागू होने वाली 6 गाइडलाइंस भी जारी कीं:

  1. निजी मुचलके की राशि कैदी की आर्थिक स्थिति के अनुसार तय होनी चाहिए, न कि अत्यधिक, दंडात्मक या अव्यवहारिक हो।
  2. पहली बार पारोल पर ज़मानतदार मांगा जा सकता है, लेकिन यदि समिति की जांच में साबित हो कि कैदी निर्धन है, तो उसे बिना ज़मानतदार के रिहा किया जाना चाहिए।
  3. यदि पहले पारोल में कोर्ट या समिति ने ज़मानतदार की शर्त हटाई हो, और आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव न हो, तो बाद में भी शर्त नहीं लगाई जानी चाहिए।
  4. अगर पहले ज़मानतदार की शर्त लगाई गई थी लेकिन कैदी बाद में छूट की मांग करता है, और वह गरीबी का प्रमाण देता है, तो समिति को छूट देनी होगी।
  5. यह दिशा-निर्देश उन मामलों पर भी लागू होंगे, जिनमें मानवीय आधार पर विशेष या छूट वाली पारोल दी जाती है।
  6. हर बार ज़मानतदार की छूट दिए जाने का रिकॉर्ड केंद्रीकृत डाटाबेस में दर्ज हो, और भविष्य की पारोल याचिकाएं राज्य की निगरानी में लीगल-एड सिस्टम के ज़रिये प्रोसेस हों।
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कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में सभी अधिकारी इन नियमों के तहत विवेकाधिकार का प्रयोग मानवीय, तार्किक और संवैधानिक तरीके से करें।

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