सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: पश्चिम बंगाल शिक्षा सचिव नए सिरे से सुनवाई कर अंशकालिक शिक्षकों के वेतन दावों का निर्णय लें

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के अंशकालिक (Part-time) अनुबंधित शिक्षकों द्वारा दायर अवमानना याचिकाओं के एक समूह का निपटारा करते हुए स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वे शिक्षकों को सुनवाई का अवसर देने के बाद उनके वेतन बकाया (Arrears) के दावों पर नए सिरे से निर्णय लें।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश तब पारित किया, जब नियमित शिक्षकों के बराबर मूल वेतन (Basic Pay) के भुगतान के संबंध में कोर्ट के पिछले निर्देशों का पालन न करने के आरोप लगाए गए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अवमानना कार्यवाही द स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल एवं अन्य बनाम अनिर्बान घोष एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 16 जुलाई, 2024 के आदेश के कथित उल्लंघन से उत्पन्न हुई थी। उस आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कलकत्ता हाईकोर्ट के 3 सितंबर, 2020 के फैसले का पालन करने का निर्देश दिया था।

हाईकोर्ट के 2020 के फैसले ने एकल न्यायाधीश के आदेश को संशोधित करते हुए राज्य को निर्देश दिया था कि:

  1. गैर-सरकारी सहायता प्राप्त उच्चतर माध्यमिक स्कूलों के उच्चतर माध्यमिक अनुभाग में काम करने वाले नियमित शिक्षक के मूल वेतन के बराबर वेतन का भुगतान 28 जुलाई, 2010 से 24 दिसंबर, 2013 की अवधि के लिए किया जाए।
  2. अप्रैल 2007 से दिसंबर 2009 की अवधि और 24 दिसंबर, 2013 के बाद की अवधि के लिए मूल वेतन के दावे को सही ठहराने वाले शिक्षकों के प्रतिवेदन (Representations) पर विचार किया जाए।
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याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इन स्पष्ट निर्देशों के बावजूद उन्हें राहत नहीं दी गई।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राज्य ने उनकी सेवा की पूरी अवधि के लिए देय भुगतान जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि यद्यपि प्रतिवेदन प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन “उन्हें कभी भी सुनवाई का अवसर प्रदान नहीं किया गया।” इसके अलावा, उन्होंने कहा कि “संबंधित स्कूल अधिकारियों से प्रासंगिक रिकॉर्ड नहीं मंगाए गए,” जिससे देय राशि की उचित गणना और भुगतान नहीं हो सका।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के उस निर्देश पर बहुत जोर दिया जिसमें कहा गया था कि सचिव “रिट याचिकाकर्ताओं और संबंधित स्कूलों को सुनवाई का अवसर देने पर ऐसे प्रतिवेदन पर विचार करेंगे।”

दूसरी ओर, प्रतिवादी-अवमाननाकर्ताओं ने जवाब दाखिल कर दावा किया कि कोर्ट के आदेशों का “कोई जानबूझकर उल्लंघन” नहीं किया गया है। उन्होंने दलील दी कि 28 जुलाई, 2010 से 24 दिसंबर, 2013 की विशिष्ट अवधि के लिए बकाया राशि का “विधिवत वितरण कर दिया गया है।”

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

सुनवाई के दौरान, प्रतिवादी-अवमाननाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कपिल सिब्बल ने प्रक्रियात्मक खामियों के संबंध में एक महत्वपूर्ण स्वीकारोक्ति की। कोर्ट ने अपने फैसले में नोट किया:

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“विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता, श्री कपिल सिब्बल ने निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया कि याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट द्वारा जारी निर्देशों, जैसा कि इस न्यायालय द्वारा विस्तारित किया गया था, के अनुसार सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था, और न ही उनके प्रतिवेदनों पर निर्णय लेते समय संबंधित स्कूलों के रिकॉर्ड मंगाए गए थे।”

इस प्रक्रियात्मक चूक को स्वीकार करते हुए, कोर्ट ने यह तय किया कि याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर नए सिरे से विचार करना आवश्यक है।

निर्णय और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित विशिष्ट निर्देशों के साथ अवमानना याचिकाओं का निपटारा किया:

  1. नया प्रतिवेदन: याचिकाकर्ताओं को छह सप्ताह के भीतर स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव के समक्ष एक नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी गई है, जिसमें “हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश के संदर्भ में उनकी पूरी शिकायतों/दावों/हकदारियों” का विवरण हो।
  2. सुनवाई का अवसर: कोर्ट ने निर्देश दिया कि सचिव “याचिकाकर्ताओं को प्रतिनिधि क्षमता में व्यक्तिगत रूप से या कानूनी सलाहकार/अधिवक्ता के माध्यम से सुनवाई का अवसर प्रदान करेंगे।”
  3. रिकॉर्ड का निरीक्षण: कोर्ट ने आदेश दिया कि “सुनवाई के साथ आगे बढ़ने से पहले याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति से संबंधित रिकॉर्ड संबंधित स्कूलों से मंगाए जाएंगे और पक्षों को उनका निरीक्षण करने की अनुमति दी जाएगी।”
  4. समयबद्ध निर्णय: सक्षम प्राधिकारी को चार महीने की अवधि के भीतर एक “विस्तृत तर्कपूर्ण आदेश” (Detailed Reasoned Order) पारित करने का निर्देश दिया गया है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रतिकूल आदेश पारित किया जाता है, तो याचिकाकर्ताओं के पास कानून के अनुसार उपलब्ध कानूनी उपायों का लाभ उठाने का विकल्प खुला रहेगा।

केस का विवरण:

  • केस टाइटल: गुरुपद बेरा और अन्य बनाम विनोद कुमार और अन्य
  • केस नंबर: अवमानना याचिका (सिविल) डायरी संख्या 18826 ऑफ 2025 इन एसएलपी (सिविल) नंबर 14355 ऑफ 2021 (और संबंधित मामले)
  • कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

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