17 वर्ष बाद विशिष्ट निष्पादन न्यायसंगत नहीं; ‘तत्परता और इच्छा’ तय करने का कोई तयशुदा फ़ॉर्मूला नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विक्रय समझौते के निष्पादन के 17 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की राहत देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने दोहराया कि ‘तत्परता और इच्छा’ (readiness and willingness) के निर्धारण के लिए कोई निश्चित या जकड़बंदी वाला फ़ॉर्मूला नहीं है और यह प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायसंगत संतुलन स्थापित करने और अनुचित लाभ (unjust enrichment) को रोकने के लिए वादी को ₹3 करोड़ की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया।

यह अपील दिल्ली हाईकोर्ट के 3 सितंबर 2025 के निर्णय से उत्पन्न हुई थी, जो RFA (OS) No. 12 of 2021 में पारित किया गया था। अपीलकर्ता सुभाष अग्रवाल ने 22 जनवरी 2008 को हुए विक्रय समझौते के आधार पर विशिष्ट निष्पादन का वाद दायर किया था। यह समझौता दिल्ली के अशोक विहार, फेज-I स्थित मकान संख्या C-20 (300 वर्ग गज) की खरीद के लिए किया गया था, जिसकी कुल बिक्री कीमत ₹6.11 करोड़ तय हुई थी।

समझौते के तहत, निष्पादन के दिन ₹60 लाख अग्रिम राशि (earnest money) के रूप में अदा किए गए थे। इसके अतिरिक्त, 24 मार्च 2008 को ₹30 लाख और दिए गए। इस प्रकार, प्रतिवादियों ने कुल ₹90 लाख की प्राप्ति स्वीकार की।

15 फरवरी 2021 को ट्रायल कोर्ट ने विशिष्ट निष्पादन के पक्ष में वाद का डिक्री पारित करते हुए यह माना था कि वादी ने अनुबंध के पालन के लिए अपनी तत्परता और इच्छा सिद्ध कर दी है तथा प्रतिवादी अपने संविदात्मक दायित्वों के निर्वहन में विफल रहे हैं।

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प्रतिवादियों की अपील को हाईकोर्ट ने प्रारंभ में 12 अप्रैल 2021 को खारिज कर दिया था। उस समय अदालत ने यह कहा था कि वादी के पास शेष राशि चुकाने की वित्तीय क्षमता थी। हालांकि, यह आदेश बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा SLP No. 12465 of 2021 में निरस्त कर दिया गया और मामले को नए सिरे से विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेजा गया।

पुनः सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने विशिष्ट निष्पादन की डिक्री को निरस्त कर दिया, वाद को खारिज किया, ₹60 लाख की अग्रिम राशि जब्त करने की अनुमति दी तथा ₹30 लाख की अतिरिक्त राशि को 24 मार्च 2008 से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया। इस निर्णय से आहत होकर वादी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस प्रश्न की जांच की कि क्या वादी ने अनुबंध के अपने हिस्से के पालन के लिए तत्परता और इच्छा सिद्ध की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि वादी 10 मई 2008 की नियत तिथि पर ₹5.21 करोड़ की शेष राशि चुकाने के लिए आवश्यक वित्तीय क्षमता प्रदर्शित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि वादी उक्त तिथि पर सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में उपस्थित नहीं हुआ।

साथ ही, अदालत ने यह भी पाया कि प्रतिवादी भी अपने संविदात्मक दायित्वों का पूर्ण रूप से निर्वहन नहीं कर पाए थे, विशेष रूप से म्यूटेशन कराने और संपत्ति को लीज़होल्ड से फ्रीहोल्ड में परिवर्तित कराने के संबंध में।

स्थापित विधि को दोहराते हुए अदालत ने कहा कि ‘तत्परता और इच्छा’ के निर्धारण के लिए कोई जकड़बंदी वाला फ़ॉर्मूला नहीं है और इसका आकलन प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

मामले के समग्र तथ्यों और समझौते के निष्पादन के बाद 17 वर्ष से अधिक समय बीत जाने को देखते हुए, अदालत ने माना कि इस स्तर पर विशिष्ट निष्पादन की राहत देना न्यायसंगत नहीं होगा।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इक्विटी इस प्रकार काम करनी चाहिए कि किसी पक्ष को अनुचित लाभ न मिले और जहाँ दोनों पक्ष दोषी हों, वहाँ यथासंभव उन्हें उनकी मूल स्थिति में वापस लाया जाए। अदालत ने कहा कि केवल अग्रिम राशि की जब्ती करने से प्रतिवादियों को अनुचित लाभ मिलेगा।

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पूर्ण न्याय करने और पक्षकारों के बीच इक्विटी संतुलित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में संशोधन किया और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे आदेश की तिथि से चार सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता को ₹3 करोड़ की एकमुश्त राशि का भुगतान करें। अदालत ने कहा कि इससे अपीलकर्ता की पूरी तरह क्षतिपूर्ति हो जाएगी, संविदा से जुड़ी आगे की जटिलताओं से बचा जा सकेगा और एक दशक से अधिक समय से लंबित विवाद का अंत हो जाएगा।

अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय में ₹3 करोड़ के भुगतान के निर्देश तक संशोधन किया गया और सभी लंबित आवेदन निस्तारित कर दिए गए।

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