कुत्तों के मामले में इतनी अर्जियाँ, इंसानों के केस में भी नहीं आतीं: सुप्रीम कोर्ट ने दायर याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर जताई हैरानी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान (suo motu) याचिका में दाखिल की जा रही इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशनों (अंतरिम अर्जियों) की भारी संख्या पर हैरानी जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि इतनी अर्जियां तो आमतौर पर इंसानों से जुड़े मामलों में भी दाखिल नहीं होतीं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष जब दो वकीलों ने इस मामले का उल्लेख किया और बताया कि उन्होंने एक अंतरिम अर्जी दाखिल की है, तो न्यायमूर्ति मेहता ने कहा,
“इतनी अर्जियाँ तो इंसानों के मामलों में भी नहीं आतीं।”

अदालत ने बताया कि यह मामला बुधवार को एक विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है, जिसमें न्यायमूर्ति नाथ, न्यायमूर्ति मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया शामिल होंगे। अदालत ने भरोसा दिलाया कि बुधवार को सभी लंबित याचिकाओं पर सुनवाई की जाएगी।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा 28 जुलाई 2023 को स्वतः संज्ञान लेते हुए शुरू किया गया था। यह संज्ञान राजधानी दिल्ली में आवारा कुत्तों के काटने और बच्चों में रैबीज जैसी घटनाओं की मीडिया रिपोर्ट पर लिया गया था।

7 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों, खासकर शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और खेल परिसरों जैसे सार्वजनिक स्थानों में, को “चिंताजनक” बताया और कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए:

  • सभी आवारा कुत्तों को, जिन्हें संस्थागत क्षेत्रों से पकड़ा जाए, बिना देरी के स्टरलाइज़ व वैक्सीनेट कर सरकारी आश्रयों में रखा जाए
  • पकड़े गए कुत्तों को उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए जहाँ से उन्हें लाया गया था।
  • राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों व एक्सप्रेसवे से आवारा पशुओं (गाय, बैल आदि) को हटाने के भी निर्देश दिए गए।
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अदालत ने कहा कि संस्थागत परिसरों में बार-बार हो रहे कुत्तों के हमले प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि एक “प्रणालीगत विफलता” को दर्शाते हैं।

इस मामले में देशभर से कई पक्षों की ओर से आवेदन दाखिल किए गए हैं—कुछ पशु अधिकारों की रक्षा की मांग करते हैं तो कुछ सार्वजनिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कहते हैं। अब यह केस एक बड़े सामाजिक और कानूनी विमर्श का रूप ले चुका है।

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सुप्रीम कोर्ट की ताज़ा टिप्पणी इस ओर इशारा करती है कि यह मसला अब केवल आवारा कुत्तों की समस्या नहीं, बल्कि एक जटिल और बहुआयामी कानूनी चुनौती बन चुका है, जिसमें मानव और पशु अधिकारों के बीच संतुलन तलाशा जा रहा है।

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