शहरी पुनर्विकास परियोजनाओं में अपनी विफलता छिपाने के लिए IBC मोराटोरियम का इस्तेमाल ढाल की तरह नहीं कर सकते बिल्डर: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू होने से पहले किसी बिल्डर के विकास अधिकारों (Development Rights) को वैध रूप से समाप्त कर दिया गया है, तो वे अधिकार कॉरपोरेट देनदार (Corporate Debtor) की “संपत्ति” नहीं माने जाएंगे। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (IBC) की धारा 14 के तहत मिलने वाला मोराटोरियम (कानूनी कार्यवाही पर रोक) लागू नहीं होगा।

28 नवंबर, 2025 को दिए गए अपने फैसले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि IBC का उपयोग पुनर्विकास (Redevelopment) को अनिश्चित काल तक रोकने या सहकारी आवास समितियों और झुग्गीवासियों के वैध अधिकारों में बाधा डालने के लिए नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें वैधानिक अधिकारियों को खेर नगर सुखसदन को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड के पुनर्विकास की अनुमति एक नए बिल्डर के माध्यम से प्रोसेस करने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि (Factual Matrix)

यह विवाद मुंबई के बांद्रा (पूर्व) स्थित “खेर नगर सुख सदन” के पुनर्विकास से जुड़ा है।

  • 1996: सोसाइटी और म्हाडा (MHADA) के बीच लीज डीड निष्पादित की गई थी।
  • 2005: सोसाइटी ने ए ए एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड (अपीलकर्ता नंबर 1) के साथ इमारत को गिराने और पुनर्निर्माण के लिए एक विकास समझौता (Development Agreement) किया। परियोजना को 24 महीने के भीतर पूरा किया जाना था।
  • 2014: देरी के कारण, एक पूरक समझौता किया गया, जिसमें समय सीमा को कमेंसमेंट सर्टिफिकेट से 40 महीने तक बढ़ाया गया।
  • देरी और विफलता: डेवलपर द्वारा कुछ भुगतान किए जाने के बावजूद, परियोजना लगभग दो दशकों तक अटकी रही। सोसाइटी का आरोप था कि 60 में से 41 सदस्यों को कभी किराया (Transit Rent) नहीं मिला।
  • समझौता समाप्ति: बिल्डर की निरंतर विफलता के कारण, सोसाइटी ने जून और दिसंबर 2019 में नोटिस जारी कर समझौतों को समाप्त (Terminate) कर दिया।
  • दिवाला प्रक्रिया: कॉरपोरेट देनदार के खिलाफ दूसरी CIRP 6 दिसंबर, 2022 को शुरू हुई।
  • नया डेवलपर: दिसंबर 2023 में, सोसाइटी ने एक नए डेवलपर (ट्राई स्टार डेवलपमेंट एलएलपी) को नियुक्त किया।
  • हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: सोसाइटी ने नए डेवलपर के लिए मंजूरी मांगने हेतु बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने 11 सितंबर, 2024 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
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पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता (रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल) का तर्क: रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने तर्क दिया कि 2005 और 2014 के समझौतों से उत्पन्न विकास अधिकार कॉरपोरेट देनदार की “संपत्ति” (Asset) हैं और IBC की धारा 14 के तहत मोराटोरियम द्वारा सुरक्षित हैं। उन्होंने दावा किया कि समझौतों की समाप्ति एकतरफा और अवैध थी, और ये अधिकार कंपनी के पुनरुद्धार के लिए आवश्यक थे। उन्होंने विक्ट्री आयरन वर्क्स लिमिटेड बनाम जितेंद्र लोहिया मामले का हवाला दिया।

प्रतिवादी (सोसाइटी) का तर्क: सोसाइटी की ओर से तर्क दिया गया कि समझौतों को 2019 में ही समाप्त कर दिया गया था, जो कि 2022 में दूसरी CIRP शुरू होने से बहुत पहले की बात है। इसलिए, दिवाला प्रक्रिया शुरू होने के समय कोई भी “संपत्ति” अस्तित्व में नहीं थी। उन्होंने राजेंद्र के. भुट्टा बनाम म्हाडा मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 14(1)(d) केवल तभी लागू होती है जब संपत्ति पर कॉरपोरेट देनदार का “कब्जा” (Occupation) हो, जबकि इस मामले में कब्जा हमेशा सोसाइटी के पास ही था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

शीर्ष अदालत ने मामले के तथ्यों और कानूनी प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया:

1. समाप्ति की वैधता (Validity of Termination)

कोर्ट ने पाया कि समझौते की समाप्ति दिवालियेपन के कारण नहीं, बल्कि बिल्डर की “लंबे समय तक और अक्षम्य विफलता” (Prolonged and inexcusable default) के कारण हुई थी। कोर्ट ने कहा कि जब तक समाप्ति का कारण केवल दिवालियापन न हो, NCLT के पास वैध संविदात्मक समाप्ति में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। चूंकि समाप्ति CIRP से पहले हुई थी, यह वैध है।

2. क्या विकास अधिकार ‘संपत्ति’ हैं?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर निष्पादित या सशर्त अनुबंध “संपत्ति” नहीं होता। सुशील कुमार अग्रवाल बनाम मीनाक्षी साधु मामले का संदर्भ देते हुए, पीठ ने कहा कि डेवलपर के पास केवल जमीन पर प्रवेश करने का सीमित लाइसेंस था, जिसने कोई मालिकाना या कब्जा संबंधी अधिकार (Proprietary or Possessory Right) नहीं बनाया। चूंकि CIRP शुरू होने से पहले समझौता समाप्त हो चुका था, इसलिए कॉरपोरेट देनदार के पास कोई भी अस्तित्वगत अधिकार नहीं बचा था।

3. मोराटोरियम और कब्जा

राजेंद्र के. भुट्टा मामले पर भरोसा जताते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि IBC की धारा 14(1)(d) केवल तभी लागू होती है जब संपत्ति कॉरपोरेट देनदार के “कब्जे” (Occupied by) में हो। चूंकि ए ए एस्टेट्स ने कभी भी भौतिक कब्जा प्राप्त नहीं किया था, इसलिए मोराटोरियम लागू नहीं होता।

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4. सामाजिक न्याय और मानवीय दृष्टिकोण

फैसले को लिखते हुए जस्टिस महादेवन ने मामले के मानवीय पहलू पर जोर दिया। उन्होंने कहा:

“IBC को कभी भी उन कॉरपोरेट देनदारों के लिए शरणस्थली के रूप में नहीं बनाया गया था, जो अपने आचरण से संविदात्मक या वैधानिक दायित्वों को पूरा करने का कोई नेक इरादा नहीं दिखाते… कानून ऐसी स्थिति की अनुमति नहीं दे सकता जहां इन्सॉल्वेंसी प्रोटेक्शन विस्थापन को बनाए रखने का एक साधन बन जाए।”

कोर्ट ने कहा कि शहरी पुनर्विकास परियोजनाएं केवल व्यावसायिक उद्यम नहीं हैं, बल्कि ये नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करने का प्रयास हैं। आर्थिक पुनरुद्धार की आड़ में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले गरिमापूर्ण आवास के अधिकार को टाला नहीं जा सकता।

निर्णय (Decision)

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. सोसाइटी द्वारा समझौतों की समाप्ति CIRP से पहले हुई थी और यह वैध है।
  2. रद्द किए गए समझौते IBC के तहत “संपत्ति” नहीं माने जाएंगे।
  3. बॉम्बे हाईकोर्ट का वैधानिक अधिकारियों को नए डेवलपर के प्रस्ताव को प्रोसेस करने का निर्देश बिल्कुल सही था।
  4. प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

कोर्ट ने वैधानिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे हाईकोर्ट के आदेश का पालन दो महीने के भीतर करें।

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