डिवोर्स क्लाइंट से नज़दीकी बढ़ाने वाली महिला वकील पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा — “हम यह उम्मीद नहीं करते”

वकालत के पेशे में प्रोफेशनल सीमाओं और नैतिकता को सर्वोपरि बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला वकील के आचरण पर कड़े सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने महिला अधिवक्ता को अपने ही मुवक्किल के साथ अंतरंग संबंध बनाने के लिए फटकार लगाई, जबकि वह उसे उसके वैवाहिक विवाद (तलाक) के मामले में कानूनी सलाह दे रही थीं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि एक वकील और मुवक्किल के बीच पेशेवर दायरा बना रहना चाहिए, खासकर तब जब मुवक्किल का तलाक अभी तक कानूनी रूप से संपन्न न हुआ हो।

“हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी”

मामला तब सामने आया जब शीर्ष अदालत लंदन में रह रहे एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस व्यक्ति पर महिला वकील ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था।

सुनवाई के दौरान पीठ ने 36 वर्षीय महिला वकील के आचरण पर हैरानी जताई। कोर्ट ने पूछा कि एक वकील होने के नाते उन्होंने अपने ही मुवक्किल के साथ व्यक्तिगत संबंध क्यों बनाए, जबकि वह उनसे तलाक के मामले में सलाह लेने आया था।

पीठ ने टिप्पणी की, “वह एक वकील हैं। वह याचिकाकर्ता के तलाक का मामला संभाल रही थीं। आपने ऐसा क्यों किया? हमें (वकीलों से) ऐसी उम्मीद नहीं है।”

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जब महिला वकील ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने केवल उस व्यक्ति का “मार्गदर्शन” (Guidance) किया था और कभी औपचारिक रूप से उनका केस नहीं लड़ा, तो कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। जजों ने कहा कि तकनीकी रूप से वकालतनामा दाखिल करना या न करना मायने नहीं रखता, मुद्दा यह है कि वह कानूनी सलाहकार की भूमिका में थीं और साथ ही व्यक्तिगत रिश्ते में भी शामिल हो गईं।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “उन्हें पता होना चाहिए था कि जब तक उसे तलाक की डिक्री नहीं मिल जाती, वह शादी नहीं कर सकता। वह (वकील) कोई साधारण या अशिक्षित महिला नहीं हैं, वह एक अधिवक्ता हैं।”

वकील के पुराने आचरण पर भी सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने कोर्ट के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे। उन्होंने आरोप लगाया कि महिला वकील का यह आचरण नया नहीं है। मल्होत्रा ने दलील दी कि महिला ने अलग-अलग लोगों के खिलाफ “चार एक जैसे मामले” दर्ज कराए हैं।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी महिला के आचरण पर संज्ञान लिया था और उनके खिलाफ जांच के आदेश भी दिए थे।

दूसरी ओर, महिला वकील के वकील ने दलील दी कि आरोपी जांच में शामिल नहीं हो रहा है और इसे “प्रेम संबंध” बताते हुए कहा, “मैं गवाही नहीं दे सकता कि लव बर्ड्स (प्रेमी युगल) के बीच क्या हुआ था।”

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें याचिकाकर्ता को “भगोड़ा” घोषित करने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि वह व्यक्ति विवाद शुरू होने से काफी पहले से लंदन में रह रहा है, इसलिए उसे भगोड़ा नहीं कहा जा सकता।

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“इस मुसीबत से बाहर निकलें और पेशे पर ध्यान दें”

सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकील के वकील को सख्त सलाह दी कि वे अपनी क्लाइंट को समझाएं।

पीठ ने कहा, “अपने मुवक्किल को सलाह दें। इस मुसीबत (Mess) से बाहर निकलें। उन्हें अपने पेशे (वकालत) पर ध्यान केंद्रित करने दें।”

मामले की अजीबोगरीब परिस्थितियों को देखते हुए, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत दी और आदेश दिया कि उसके खिलाफ “कोई भी दंडात्मक कदम” (No coercive steps) न उठाया जाए। कोर्ट ने नोट किया कि चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी है और याचिकाकर्ता ने भारत आने पर जांच में सहयोग करने की इच्छा जताई है।

कोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष को घटनाओं का विस्तृत ब्यौरा देते हुए हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी।

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