दिल्ली हाईकोर्ट: प्रतिस्पर्धी उत्पादों को ‘धोखा’ बताने वाला पतंजलि का च्यवनप्राश विज्ञापन भ्रामक; 72 घंटे में हटाने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि वाणिज्यिक भाषण (commercial speech) के मौलिक अधिकार में झूठे या भ्रामक विज्ञापन शामिल नहीं हैं और इससे किसी प्रतिस्पर्धी को बदनाम या अपमानित करने की अनुमति नहीं मिलती। अदालत ने पतंजलि को आदेश दिया है कि वह अपने “धोखा” शब्द वाले च्यवनप्राश विज्ञापन को 72 घंटे के भीतर हटा ले।

न्यायमूर्ति तेजस कारिया ने कहा कि कोई भी विज्ञापन उस क्षण संवैधानिक सुरक्षा खो देता है, जब वह “झूठा, भ्रामक, अनुचित या छलपूर्ण” हो जाता है। अदालत ने पाया कि पतंजलि के विज्ञापन से यह संदेश गया कि अन्य सभी निर्माता उपभोक्ताओं को धोखा दे रहे हैं, जो कानूनी सीमा का उल्लंघन है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “विवादित विज्ञापन से स्पष्ट होता है कि प्रतिवादियों (पतंजलि) ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सभी च्यवनप्राश निर्माता अपने ग्राहकों को धोखा दे रहे हैं। यदि कोई विज्ञापन झूठा, भ्रामक, अनुचित या छलपूर्ण हो जाए, तो उसे अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली सुरक्षा समाप्त हो जाती है।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में झूठ फैलाने या किसी प्रतिस्पर्धी को बदनाम करने का अधिकार शामिल नहीं है। न्यायमूर्ति कारिया ने कहा कि वाणिज्यिक भाषण का अधिकार भी अनुच्छेद 19(2) के तहत “युक्तिसंगत प्रतिबंधों” के अधीन है।

यह फैसला डाबर इंडिया लिमिटेड की याचिका पर आया, जिसमें कंपनी ने पतंजलि के विज्ञापन को तुरंत रोकने की मांग की थी। डाबर ने तर्क दिया कि यह विज्ञापन “स्वभावतः मानहानिकारक और अपमानजनक” है, क्योंकि इसमें सभी च्यवनप्राश निर्माताओं को नकारात्मक रूप से दिखाया गया है।

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डाबर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप सेठी ने अदालत को बताया कि उनकी कंपनी च्यवनप्राश बाजार में लगभग 60% हिस्सेदारी रखती है। उन्होंने कहा कि विज्ञापन में प्रयुक्त शब्द “धोखा” किसी एक ब्रांड को नहीं बल्कि पूरी उद्योग को बदनाम करता है।

पतंजलि की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने बचाव करते हुए कहा कि विज्ञापन में डाबर या किसी विशेष उत्पाद का उल्लेख नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि “धोखा” शब्द का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया गया कि पतंजलि का उत्पाद अधिक स्वास्थ्यवर्धक है और इसमें कुछ विशेष घटक हैं जो अन्य च्यवनप्राश में नहीं हैं। नायर ने यह भी दलील दी कि ऐसा विज्ञापन ‘पफरी’ (puffery) या अतिशयोक्ति के दायरे में आता है, जो वाणिज्यिक भाषण के अधिकार के तहत संरक्षित है।

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न्यायमूर्ति कारिया ने इन तर्कों को अस्वीकार करते हुए कहा कि भले ही विज्ञापन में किसी विशेष ब्रांड का नाम न लिया गया हो, लेकिन सभी उत्पादों को “धोखा” बताना बाजार में अग्रणी कंपनियों को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञापनकर्ता अपने उत्पाद की खूबियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं, लेकिन वे अन्य उत्पादों को बदनाम नहीं कर सकते।

अदालत ने कहा, “जहाँ यह अनुमति है कि कोई विज्ञापन अपने उत्पाद की विशेषताओं को अतिशयोक्ति के साथ प्रस्तुत करे, वहीं उसे दूसरों के उत्पादों को बदनाम या नीचा दिखाने का अधिकार नहीं है। तुलनात्मक विज्ञापन स्वीकार्य है, परंतु यह भ्रामक या अपमानजनक नहीं होना चाहिए।”

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अदालत ने पतंजलि के विज्ञापन को संवैधानिक और वाणिज्यिक सिद्धांतों का उल्लंघन मानते हुए कंपनी को निर्देश दिया कि वह 72 घंटे के भीतर यह च्यवनप्राश विज्ञापन सभी माध्यमों से हटा ले।
अदालत ने कहा कि वाणिज्यिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को “किसी को बदनाम करने या उपभोक्ताओं को भ्रमित करने के लाइसेंस” के रूप में नहीं देखा जा सकता।

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