सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों के झंडे वाले खंभे हटाने के आदेश को चुनौती देने वाली माकपा की याचिका दूसरी पीठ को सौंपी


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) द्वारा दायर उस याचिका को दूसरी पीठ के पास भेज दिया जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें तमिलनाडु के सार्वजनिक स्थलों से राजनीतिक दलों के स्थायी झंडे वाले खंभे (flag poles) हटाने का निर्देश दिया गया था।

न्यायमूर्ति जे. के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय विष्णोई की पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले भी न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की थी। इसलिए यह मामला उसी समन्वय पीठ (coordinate bench) के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।

अदालत ने कहा, “यह मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, और यदि आवश्यकता हो, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश से उपयुक्त आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं।”

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मद्रास हाईकोर्ट ने पहले एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा था जिसमें तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों, सामुदायिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं को निर्देश दिया गया था कि वे 12 सप्ताह के भीतर सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए स्थायी झंडे वाले खंभे हटा लें।
हाईकोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक स्थल सभी नागरिकों के हैं और किसी भी राजनीतिक या निजी संगठन द्वारा उनका स्थायी कब्जा या उपयोग असंवैधानिक है।

माकपा ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि यह निर्णय पार्टी की राजनीतिक अभिव्यक्ति (political expression) के अधिकार का हनन करता है और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया कि पार्टी देश में मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी अग्रदूत (revolutionary vanguard) रही है और अपने झंडों तथा प्रतीकों के माध्यम से जनता से उसका सीधा संबंध बना रहता है।

माकपा ने दलील दी कि हाईकोर्ट के व्यापक निर्देश “अस्वीकार्य न्यायिक कानून निर्माण” (impermissible judicial legislation) के समान हैं और इससे अदालत ने प्रशासनिक नीतियों के क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है।

तमिलनाडु में राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक सड़कों और सरकारी भूमि पर झंडे वाले खंभे लगाने का मुद्दा लंबे समय से विवादित रहा है। राज्य सरकार को इस पर पर्याप्त नियंत्रण न रखने के लिए कई बार न्यायिक फटकार भी झेलनी पड़ी है।

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अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह मामला दूसरी पीठ को सौंपे जाने के बाद यह देखा जाएगा कि क्या हाईकोर्ट का आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक प्रतीकवाद के अधिकार का उल्लंघन करता है या यह सार्वजनिक स्थलों के उपयोग को नियंत्रित करने के राज्य के वैध अधिकारों के दायरे में आता है।

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