दिल्ली हाईकोर्ट: तलाक न होने तक पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल वैवाहिक विवादों के आधार पर किसी महिला को उसके पति की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उनका विवाह विधिक रूप से तलाक में समाप्त न हो गया हो।

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति मधु जैन की खंडपीठ ने कहा कि पति-पत्नी के बीच विवाद होने का अर्थ यह नहीं है कि पत्नी का पेंशन पाने का अधिकार समाप्त हो जाता है। अदालत ने अपने आदेश (1 अगस्त) में कहा, “याचिकाकर्ता (पत्नी) द्वारा मृतक से भरण-पोषण की मांग करने के लिए आवेदन दायर किया जाना इस बात को दर्शाता है कि उनके बीच वैवाहिक विवाद थे। किंतु जब तक यह विवाद तलाक में परिणत नहीं होता, तब तक याचिकाकर्ता को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।”

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें महिला ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को चुनौती दी थी। CAT ने सरकार को महिला को पेंशन देने का निर्देश दिया था लेकिन बकाया राशि अक्टूबर 2014 से ही देने को कहा था, जब उसने याचिका दायर की थी।

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महिला के पति का निधन सितंबर 2009 में हुआ था, जबकि उसने पारिवारिक पेंशन का दावा 2013 में पेश किया। सरकार ने दावा यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मृतक ने अपने परिवार की सूची में उसका नाम नहीं लिखा था और उनके बीच वैवाहिक विवाद थे।

अदालत ने सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि आवेदन में देरी पत्नी के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकती। अदालत ने कहा, “हम मानते हैं कि इस आधार पर याचिकाकर्ता को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।”

खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पति द्वारा पत्नी का नाम परिवार सूची में न लिखना उसके विधिक अधिकार को खत्म नहीं करता। कोई अन्य वैध दावा न होने की स्थिति में वह पेंशन पाने की हकदार है।

अदालत ने CAT का आदेश रद्द करते हुए महिला को उसके पति की मृत्यु (सितंबर 2009) से ही पारिवारिक पेंशन देने का निर्देश दिया। साथ ही सरकार को चार माह के भीतर सभी बकाया राशि ब्याज सहित अदा करने का आदेश दिया।

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