सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसले में अभिनेता और शिक्षा संस्थान प्रमुख मोहन बाबू और उनके बेटे विष्णु वर्धन बाबू के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। यह मामला 2019 में आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) के उल्लंघन के आरोप में दर्ज किया गया था।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
राज्य सरकार के अनुसार, 22 मार्च 2019 को मोहन बाबू और उनके बेटे विष्णु ने श्री विद्यनिकेतन एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस के छात्रों और स्टाफ के साथ मिलकर तिरुपति-मदनपल्ली रोड पर एक रैली निकाली और राज्य सरकार के खिलाफ फीस रीइम्बर्समेंट न दिए जाने को लेकर नारेबाजी की। आरोप था कि इस रैली से यातायात में बाधा आई और यात्रियों को असुविधा हुई।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि FIR और चार्जशीट में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि इस धरने से चुनाव प्रक्रिया में कोई अनुचित प्रभाव पड़ा या किसी की मताधिकार की स्वतंत्रता में बाधा आई।
पीठ ने कहा, “यह माना जाए कि राज्य सरकार का पक्ष सही भी हो, तब भी यह नहीं कहा जा सकता कि अपीलकर्ता धरना और रैली निकालते समय ऐसी किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त थे जिससे आम जनता को चोट, असुविधा या खतरा हुआ हो।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि दोनों अपीलकर्ता भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त “विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार” का प्रयोग कर रहे थे।
अदालत ने यह भी कहा कि मामले में अभियोजन जारी रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा क्योंकि आरोप पत्र में ऐसा कुछ नहीं है जिससे कोई आपराधिक कृत्य सिद्ध हो।
मालूम हो कि मोहन बाबू श्री विद्यनिकेतन संस्थानों के अध्यक्ष हैं और विष्णु वर्धन बाबू उनके बेटे हैं। उन्होंने पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।