अवैध सट्टेबाज़ी के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘ओपिनियन ट्रेडिंग’ प्लेटफॉर्मों पर दायर चार याचिकाएं अपने पास ट्रांसफर कीं

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘ओपिनियन ट्रेडिंग’ प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली चार जनहित याचिकाओं (PIL) को विभिन्न उच्च न्यायालयों से अपने पास स्थानांतरित कर लिया। इन प्लेटफॉर्मों पर अवैध सट्टेबाज़ी और जुए को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह आदेश प्रोबो मीडिया टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड की स्थानांतरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। यह कंपनी एक ओपिनियन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का संचालन करती है।

पीठ ने आदेश में कहा, “ये सभी चार जनहित याचिकाएं इस न्यायालय में सुनी जानी चाहिए। हम बॉम्बे, गुजरात और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालयों को निर्देश देते हैं कि वे सभी संबंधित रिकॉर्ड सहित याचिकाएं जल्द से जल्द इस न्यायालय को स्थानांतरित करें। इसके बाद इन मामलों को भारत के मुख्य न्यायाधीश के निर्देशानुसार सूचीबद्ध किया जाएगा।”

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याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि दो याचिकाएं बॉम्बे हाईकोर्ट में, एक गुजरात हाईकोर्ट में और एक छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सभी याचिकाएं बॉम्बे हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दी जाएं, लेकिन कोर्ट ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल, जो सामाजिक कार्यकर्ता सुमित कपूरभाई प्रजापति की ओर से पेश हुए, ने इसका विरोध करते हुए कहा कि सभी याचिकाओं के मुद्दे एक जैसे नहीं हैं — खासकर छत्तीसगढ़ की याचिका जो जुए से संबंधित विधायी ढांचे को चुनौती देती है। उन्होंने कहा कि महज एक जैसे याचिकाकर्ता होने के आधार पर सभी मामलों को एक साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

इससे पहले 22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने प्रोबो की स्थानांतरण याचिका पर नोटिस जारी किया था और निर्देश दिया था कि गुजरात और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं पर फिलहाल कोई सुनवाई न हो।

ओपिनियन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म उन ऑनलाइन माध्यमों की तरह काम करते हैं जहां उपयोगकर्ता वास्तविक घटनाओं पर आधारित भविष्यवाणियों में हिस्सा लेते हैं। इनमें आमतौर पर ‘हां’ या ‘न’ जैसे विकल्प होते हैं, और सही भविष्यवाणी करने पर पैसे मिलते हैं, जबकि गलत होने पर दांव की राशि चली जाती है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रणाली जुए और सट्टेबाज़ी की तरह है, और इसके लिए कोई स्पष्ट नियामक ढांचा मौजूद नहीं है।

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