सिविल जज भर्ती में 3 साल की वकालत अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल जज (कनिष्ठ वर्ग) पद की भर्ती के लिए न्यूनतम तीन वर्षों की वकालत को अनिवार्य करने वाले हालिया निर्णय के खिलाफ एक पुनर्विचार याचिका दायर की गई है।

यह याचिका अधिवक्ता चंद्र सेन यादव द्वारा ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामले में दायर की गई है। याचिका में तर्क दिया गया है कि यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत प्रदत्त समानता और रोजगार के अधिकारों का उल्लंघन करता है।

पृष्ठभूमि

सुप्रीम कोर्ट की पीठ जिसमें मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ (नोट: मूल जानकारी के अनुसार CJI बीआर गवई हैं), न्यायमूर्ति एजी मसीह और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन शामिल थे, ने 20 मई को फैसला सुनाया था कि देश भर के हाईकोर्ट और राज्य सरकारें सेवा नियमों में संशोधन करें ताकि सिविल जज (कनिष्ठ वर्ग) पद के लिए न्यूनतम तीन वर्षों की वकालत को पात्रता की शर्त बनाया जा सके।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि जिन भर्तियों की प्रक्रिया इस निर्णय की तारीख से पहले शुरू हो चुकी है, उन पर यह नियम लागू नहीं होगा।

पुनर्विचार याचिका के तर्क

अधिवक्ता कुनाल यादव के माध्यम से दाखिल पुनर्विचार याचिका में मांग की गई है कि इस नियम को 2027 से लागू किया जाए ताकि 2023 से 2025 के बीच स्नातक हुए अभ्यर्थियों के साथ अन्याय न हो, क्योंकि वे पूर्व की पात्रता शर्तों के आधार पर तैयारी कर चुके हैं।

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याचिका में कहा गया है—

“इस निर्णय का तात्कालिक प्रभाव प्रतिगामी कठिनाइयों को जन्म देता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निष्पक्षता, वैध अपेक्षा और समान अवसर के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।”

याचिका में आगे यह भी कहा गया है:

  • यह निर्णय आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के उम्मीदवारों पर असमान प्रभाव डालता है।
  • यह स्थापित करने के लिए कोई ठोस या सांख्यिकीय डेटा कोर्ट के समक्ष नहीं रखा गया कि बिना वकालती अनुभव वाले या नव स्नातक जज पदों पर खराब प्रदर्शन कर रहे हैं।
  • न्यायालय ने व्यापक और राय-आधारित वक्तव्यों के आधार पर निर्णय लिया, न कि वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के आधार पर, जिससे यह निर्णय पुनर्विचार के लिए उपयुक्त बनता है।
  • यह निर्देश कि सभी राज्यों और हाईकोर्ट में सेवा नियमों में समान रूप से संशोधन हो, राज्यों की विधायी और प्रशासनिक शक्तियों का अतिक्रमण करता है।
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याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि यह नया नियम विशेष रूप से महिला उम्मीदवारों को प्रभावित करेगा, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पहले ही बाधाओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही, यह नियम न्यायिक सेवा की ओर बढ़ने वाले कई प्रतिभाशाली उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त अवरोध उत्पन्न करता है।

पुनर्विचार याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह 20 मई के निर्णय पर पुनर्विचार करे और इस नियम को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का निर्देश दे ताकि वर्तमान अभ्यर्थियों के हित सुरक्षित रह सकें।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई की तारीख निर्धारित नहीं की है।

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