सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को तीन महीने में कर्मचारियों को 25% लंबित महंगाई भत्ता देने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह अपने कर्मचारियों को लंबित महंगाई भत्ते (DA) की 25% राशि आगामी तीन महीनों के भीतर जारी करे। यह आदेश केंद्र सरकार के कर्मचारियों के साथ वेतन समानता को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में आंशिक राहत के रूप में आया है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह अंतरिम आदेश उस अपील पर सुनवाई करते हुए दिया, जो राज्य सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 2022 के आदेश के खिलाफ दायर की थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह DA का भुगतान केंद्र सरकार की दरों के अनुरूप करे।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम राहत 2009 से 2019 के बीच के लंबित महंगाई भत्ते पर लागू होगी। इससे करीब छह लाख राज्य कर्मचारी लाभान्वित होंगे।

राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ को बताया कि कुल DA भुगतान का भार राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा। उन्होंने सिर्फ 25% अंतरिम भुगतान के लिए ही लगभग ₹10,000 करोड़ का अनुमान जताया। वहीं कर्मचारियों की ओर से पेश वकीलों का कहना है कि कुल लंबित DA बकाया करीब ₹41,000 करोड़ है।

कोर्ट ने यह मानते हुए कि मामला वर्षों से लंबित है और कर्मचारियों को बढ़ती असमानता का सामना करना पड़ रहा है, आंशिक भुगतान को आवश्यक बताया। अब इस मामले की अगली सुनवाई अगस्त में होगी।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ राज्य कर्मचारी कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचे और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के समान दर पर DA की मांग की, साथ ही पूर्व वर्षों के बकाया DA की अदायगी की भी मांग की। मई 2022 में हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया और राज्य सरकार को DA दरें केंद्र के अनुरूप करने का निर्देश दिया।

हालांकि, आदेश को पूरी तरह लागू करने से हिचकिचाते हुए राज्य सरकार ने नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। तब से अब तक राज्य ने केवल मामूली DA वृद्धि की घोषणा की है, जो केंद्र की दरों से मेल नहीं खाती।

अप्रैल 2025 तक जहां केंद्र सरकार के कर्मचारी 55% DA प्राप्त कर रहे हैं, वहीं पश्चिम बंगाल के कर्मचारी हालिया 4% वृद्धि के बावजूद केवल 18% DA पा रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इस कानूनी लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, जो कर्मचारियों की मांगों को बल देता है और राज्य को क्रमिक अनुपालन का अवसर भी प्रदान करता है।

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