बॉम्बे हाई कोर्ट ने बदली जमानत शर्तें, अनावश्यक उत्पीड़न का हवाला दिया

बॉम्बे हाई कोर्ट ने टॉपवर्थ स्टील्स एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड (TSPPL) के प्रमोटर अभय लोढ़ा की जमानत शर्तों में बदलाव करते हुए कहा कि ऐसी पाबंदियां जो किसी व्यक्ति की आवाजाही को अनावश्यक रूप से सीमित करती हैं, उत्पीड़न का साधन बन सकती हैं। अदालत ने जोर दिया कि जब आरोपी कानूनी कार्यवाही में सहयोग कर रहा हो, तो जमानत की शर्तें इतनी कठोर नहीं होनी चाहिए कि वे जमानत के उद्देश्य को ही विफल कर दें।

लोढ़ा, जिन पर आईडीबीआई बैंक को ₹60.28 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोप है, को 10 सितंबर, 2024 को जमानत दी गई थी। जमानत की शर्तों के तहत उन्हें मुंबई से बाहर यात्रा करने के लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था ताकि विशेष मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) अदालत में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।

इन शर्तों को चुनौती देते हुए लोढ़ा ने अपने वकील निरंजन मुंदारगी के माध्यम से एक अंतरिम याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने अपने कामकाजी और व्यक्तिगत दायित्वों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि देश भर में यात्रा करने की आवश्यकता है और पुणे में अपनी वृद्ध मां से मिलने की भी मजबूरी है, जिसे जमानत की शर्तों के कारण पूरा करना कठिन हो गया है।

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विशेष लोक अभियोजक नेहा भिडे ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि लोढ़ा एक आर्थिक अपराध में शामिल हैं और अगर जमानत की शर्तें हटाई गईं तो वे ट्रायल में हस्तक्षेप कर सकते हैं या फरार होने का जोखिम पैदा कर सकते हैं।

हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति मिलिंद एन जाधव ने जमानत की शर्तों को अत्यधिक प्रतिबंधात्मक पाया और कहा कि जमानत का असली उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी ट्रायल के दौरान उपलब्ध रहे। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो जमानत पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए।

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अदालत ने लोढ़ा की सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को मान्यता देते हुए कहा कि उन्हें भारत के भीतर यात्रा करने की अनुमति मिलनी चाहिए। अदालत ने पुणे में अपनी बीमार मां से मिलने के लिए बार-बार ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेने की आवश्यकता को “असंगत” करार दिया और इस शर्त को हटा दिया कि उन्हें देश के भीतर यात्रा के लिए अनुमति लेनी पड़े।

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