छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुनर्वास लाभों (जैसे रोजगार) को प्रतिबंधित करने वाले प्रशासनिक निर्णय तब तक लागू नहीं किए जा सकते, जब तक उन्हें सार्वजनिक न किया गया हो। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीज़न बेंच ने माना कि केवल आंतरिक पत्राचार या गुप्त प्रशासनिक बैठकों के आधार पर किसी भूमि विस्थापित (Land Oustee) के हक को मारना मनमाना और अवैध है। कोर्ट ने इस मामले में रोजगार के बदले याचिकाकर्ता को ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब शुरू हुआ जब याचिकाकर्ता महेंद्र कुमार साहू ने 5 जनवरी 1993 को ग्राम गोविंदपुर में 1.21 एकड़ जमीन खरीदी। बाद में इस जमीन का अधिग्रहण साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा किया गया। साल 2002 में अधिग्रहण का अवार्ड पारित हुआ और याचिकाकर्ता को ₹31,291 का मुआवजा दिया गया। हालांकि, जब उन्होंने 1991 की पुनर्वास नीति के तहत रोजगार की मांग की, तो SECL ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया।
SECL और जिला कलेक्टर का तर्क था कि साहू ने जमीन 30 सितंबर 1991 की ‘कट-ऑफ डेट’ के बाद खरीदी है, इसलिए वह रोजगार के पात्र नहीं हैं। इसके खिलाफ साहू ने रिट याचिका दायर की, जिस पर सिंगल जज ने 6 नवंबर 2025 को फैसला सुनाते हुए SECL के आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को रोजगार देने के साथ ₹10 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। SECL ने इसी आदेश को डिवीज़न बेंच में चुनौती दी थी (WA No. 272 of 2026)।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (SECL): वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे ने दलील दी कि पुनर्वास पात्रता 19 जुलाई 2002 की एक बैठक के निर्णय से तय की गई थी। इसमें तय हुआ था कि जिन लोगों ने अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू होने (30.09.1991) के बाद जमीन खरीदी है, उन्हें रोजगार नहीं मिलेगा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम शिव कुमार भार्गव जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बाद में जमीन खरीदने वालों को पुनर्वास का कानूनी अधिकार नहीं होता।
प्रतिवादी (महेंद्र कुमार साहू): स्वयं पैरवी करते हुए साहू ने तर्क दिया कि 1991 की मूल पुनर्वास नीति में ऐसी किसी ‘कट-ऑफ डेट’ का जिक्र नहीं था। उन्होंने कहा कि 2002 का निर्णय केवल SECL और कलेक्टर के बीच एक “आंतरिक संवाद” था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। उन्होंने इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि उनके जैसे ही कई अन्य खरीदारों को SECL ने नौकरी दी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि जमीन के अधिग्रहण और उस पर याचिकाकर्ता के मालिकाना हक को लेकर कोई विवाद नहीं है। कोर्ट ने ‘कट-ऑफ डेट’ के मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि नागरिक परिणामों (civil consequences) वाले किसी भी प्रशासनिक निर्णय में पारदर्शिता होनी चाहिए और उसे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों को सूचित किया जाना चाहिए। एक आंतरिक प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे न तो प्रकाशित किया गया और न ही सूचित किया गया, उसे किसी व्यक्ति के अहित के लिए लागू नहीं किया जा सकता।”
बेंच ने रेखांकित किया कि 1991 की नीति में ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी और 2002 का आंतरिक निर्णय अवार्ड पारित होने के बाद लिया गया था। कोर्ट ने अधिकारियों की इस कार्रवाई को “अवैध, मनमाना और भेदभावपूर्ण” बताया।
अंतिम निर्णय
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता (जो अब एक अधिवक्ता हैं) ने कोर्ट के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि उन्हें रोजगार के बदले उचित मुआवजा दिया जाता है, तो वह संतुष्ट होंगे। SECL भी इस पर सहमत हो गया।
दोनों पक्षों की सहमति और न्याय के सिद्धांतों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आदेश दिया:
- सिंगल जज द्वारा रोजगार देने के निर्देश को रद्द किया जाता है।
- 2012 से चल रही लंबी कानूनी लड़ाई को देखते हुए, मुआवजे की राशि को ₹10 लाख से घटाकर ₹5,00,000 (पांच लाख रुपये) किया जाता है, जो कोर्ट की नजर में “उचित प्रतिफल” है।
- SECL को यह राशि 30 दिनों के भीतर चुकानी होगी।
केस विवरण:
- केस टाइटल: साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड और अन्य बनाम महेंद्र कुमार साहू और अन्य
- केस नंबर: WA No. 272 of 2026
- बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल
- दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

