आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कमर्शियल कोर्ट एक्ट, 2015 के तहत लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने की समय-सीमा अनिवार्य है, लेकिन यदि इसे 120 दिनों की अधिकतम सीमा के भीतर दाखिल कर दिया गया है, तो प्रतिवादी को देरी का कारण स्पष्ट करने का अवसर दिए बिना इसे रिकॉर्ड से हटाया नहीं जा सकता। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम की खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि प्रक्रियात्मक कानून (Procedural Law) “न्याय की दासी” है और इसका उपयोग किसी पक्ष के मौलिक अधिकारों को खत्म करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मेसर्स श्री महालक्ष्मी ऑयल मिल्स (प्रतिवादी) द्वारा बंज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (याचिकाकर्ता) के खिलाफ दायर एक वाणिज्यिक मुकदमे (C.O.S. संख्या 24/2024) से जुड़ा है। इसमें लगभग 1.35 करोड़ रुपये की वापसी और 3.21 करोड़ रुपये से अधिक के हर्जाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता को 30 अक्टूबर 2024 को समन प्राप्त हुआ था। कानून के अनुसार, लिखित बयान दाखिल करने की प्रारंभिक 30 दिनों की अवधि 6 दिसंबर 2024 को समाप्त हो गई थी। याचिकाकर्ता ने अंततः 18 फरवरी 2025 को यानी 110वें दिन अपना जवाब दाखिल किया, जो 120 दिनों की वैधानिक सीमा के भीतर था।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने लिखित बयान के साथ देरी माफी (Condonation of Delay) के लिए कोई आवेदन नहीं दिया और न ही देरी का कारण बताया। विजयवाड़ा स्थित कमर्शियल डिस्प्यूट्स की विशेष अदालत ने प्रतिवादी के आवेदन को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के लिखित बयान को रिकॉर्ड से हटा दिया, क्योंकि यह 30 दिनों के बाद बिना किसी औपचारिक अनुरोध के दाखिल किया गया था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता का तर्क था कि लिखित बयान 120 दिनों की कानूनी सीमा के भीतर दाखिल किया गया था। उनका कहना था कि “अत्यधिक तकनीकी आधारों” पर बचाव के अधिकार को छीनना न्याय का मखौल होगा। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट ने 110वें दिन बिना किसी आपत्ति के बयान स्वीकार कर लिया था, इसलिए उन्होंने मान लिया कि इसे स्वीकार कर लिया गया है।
प्रतिवादी ने दलील दी कि कमर्शियल कोर्ट एक्ट के तहत समय-सीमा अनिवार्य है। यदि लिखित बयान पहले 30 दिनों के भीतर दाखिल नहीं किया जाता है, तो इसके लिए विशिष्ट कारण बताना और अदालत द्वारा उसे रिकॉर्ड करना आवश्यक है। चूंकि ऐसा कोई आवेदन नहीं दिया गया था, इसलिए लिखित बयान कानून की नजर में अमान्य था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
अदालत ने कमर्शियल कोर्ट एक्ट द्वारा संशोधित सीपीसी के आदेश VIII नियम 1 का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने इसमें दो प्रमुख अनिवार्यताओं को रेखांकित किया:
- सकारात्मक आदेश: लिखित बयान को 30 से 120 दिनों के बीच दाखिल करने की अनुमति दी जाएगी, बशर्ते अदालत लिखित में कारण दर्ज करे और जुर्माना लगाए।
- नकारात्मक आदेश: 120 दिनों की समाप्ति के बाद लिखित बयान की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी।
पीठ ने कैलाश बनाम नन्हकू मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
“प्रक्रियात्मक कानून के दायरे में होने के कारण, इस प्रावधान को निर्देशात्मक माना जाना चाहिए न कि अनिवार्य… समय-सारणी प्रदान करने का उद्देश्य सुनवाई में तेजी लाना है, न कि उसे रोकना।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि लिखित बयान 120 दिनों के भीतर दाखिल कर दिया गया है, तो देरी के “पर्याप्त कारण” बताने वाला आवेदन 120 दिनों की अवधि बीतने के बाद भी दिया जा सकता है। पीठ ने कहा:
“अनिवार्यता यह है कि लिखित बयान 120 दिनों के बाद दाखिल नहीं किया जा सकता… लेकिन ऐसी अनिवार्यता उस देरी माफी आवेदन पर लागू नहीं होती जो 120 दिनों के भीतर पहले से दाखिल किए जा चुके बयान के लिए दिया जाना है।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि जब 110वें दिन बयान दाखिल हुआ था, तब ट्रायल कोर्ट ने केवल इसे “दाखिल” (Filed) दर्ज किया था। यदि उसी समय आवेदन की कमी की ओर इशारा किया जाता, तो याचिकाकर्ता के पास कानूनी सीमा के भीतर उसे सुधारने के लिए 10 दिन शेष थे।
निर्णय
हाईकोर्ट ने 26 दिसंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके द्वारा लिखित बयान को खारिज किया गया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को 30 दिनों के बाद हुई देरी का कारण बताते हुए औपचारिक आवेदन दाखिल करने के लिए 15 दिनों का समय दिया है।
विशेष अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह दो महीने के भीतर इस आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर प्रक्रियात्मक चूक के लिए ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया है, जो प्रतिवादी को देय होगा।
केस विवरण ब्लॉक:
- केस का शीर्षक: बंज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम मेसर्स श्री महालक्ष्मी ऑयल मिल्स
- केस संख्या: सिविल रिवीजन पिटीशन संख्या 214/2026
- न्यायाधीश: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचम
- तारीख: 17 मार्च, 2026

