महिला जज ने अपनी किताब में किया दावा, संतान का संरक्षण पाने के लिए मां बाप की 40 से 50 फीसदी याचिकाएं होती हैं फर्जी

पति और पत्नी के मध्य सम्बन्ध विच्छेद होने बाद दोनों अलग अलग हो जाते हैं उस वक्त उनकी तरफ से बच्चों के संरक्षण के लिए कोर्ट में दायर याचिकाओं में 40 से 50 फीसदी याचिकाएं फर्जी या आडम्बर युक्त होती हैं। जिसका उद्देश्य बच्चों का हित नही बल्कि कोई अदृश्य एजेंडा होता है। 

एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज ने अपनी किताब में बताया है कि माता पिता की तरफ से दायर ऐसी याचिकाओं से बच्चों के मानसिक संतुलन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जिससे वह सदमे का शिकार हो जाते है ।और समझ नही पाते कि क्या किया जाय।

प्रधान जिला जज पूनम ए बाम्बा ने अपनी किताब” पैरेंट्स एट वार कस्टडी बेटल्स इन इंडियन कोर्ट्स “ में अदालतों के अपने अनुभव को साझा करते हुए लिखा है कि जिसमें बच्चों के लिए कानूनी लड़ाइयों का चित्रण भी है । न्यूज़ एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में जज ने कहा है बच्चों के संरक्षण के लिए दायर की गई फर्जी याचिकाएं  न्याय प्रणाली पर बोझ है। बच्चों पर इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है। एवं सभी पक्षों का धन व समय बर्बाद होता है। 

पूनम ए बाम्बा ने बताया कि उनकी पुस्तक में उन बच्चों की पीड़ा को बाहर लाने का प्रयास किया गया है। जिनके पैरेंट्स उनके संरक्षण के लिए कानूनी जंग लड़ते हैं। लोग तलाक के बाद अलग हो जाते हैं जिसके बाद बच्चों के संरक्षण की लड़ाई आरम्भ हो जाती है। 

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फिर यह लड़ाई और तेज हो जाती है। दोनों पक्ष चाहते हैं कि उनका बच्चा उनके पास रहे। जिसमे सबसे ज्यादा दुर्गति बच्चे की होती है। वह चौराहे पर खड़ा होता है। माँ बाप अनजाने में बच्चे के जीवन को स्थायी रूप से खराब कर देते हैं। यह पुस्तिका ऐसे माता पिता को यह संदेश देने के लिए लिखी गई है की बच्चे का हित सर्वोपरि है।

महिला जज पूनम ने अपनी पुस्तिका में वास्तविक जीवन के अनुभव जाहिर करते हुए लिखा है की छिपा हुआ एजेंडा तलाक की अर्जी देने वाले पक्ष से बदला लेने की इक्षा से लेकर दहेज मामलों तक का होता है। कभी कभी यह मामला महिला द्वारा घरेलू हिंसा कानून के आधार पर शिकायत दर्ज कराने का भी होता है। 

जज ने लिखा कि मैं कहना चाहती हूँ दावाओं की तरह संरक्षण याचिकाएं भी नकली हो सकती हैं इस प्रकार के मसले प्रथम दष्टर्या वास्तविक प्रतीत होते हैं। लेकिन सभी असली नही होते। हालांकि मैन इस पर अध्ययन नही किया है। किन्तु यह कहना गलत नही होगा 40 से 50 प्रतिशत संरक्षण याचिकाएं का उद्देश्य बच्चों का संरक्षण प्राप्त करना नही होता है। 

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संरक्षण याचिका ज्यादातर केवल किसी छिपे मकसद को पूर्ण करने के लिए रचा गया आडम्बर होता है। इसमे तलाक की अर्जी देने वाले से लेकर दहेज प्रथा का मामला तक हो सकता है। 

इस प्रकार की फर्जी संरक्षण याचिकाएं जिनका असली उद्देश्य कुछ और हो न्याय व्यवस्था पर बोझ होती है। जिससे अगले पक्ष को भौतिक, मानसिक, और आर्थिक रूप से नुकसान होता है। ऐसी याचिकाओं से बच्चे भी तनाव ग्रस्त होते हैं। फैमिली कोर्ट में जज द्वारा किये गए अनुभव की कई कहानियां का संकलन इस किताब में है। 

जज पूनम बताती है कि ” कोर्ट का काम और सरल हो जाता यदि उनके पास प्रेम को मापने का मीटर होता। जिससे वह माता पिता का बच्चों के प्रति स्नेह को माप सकते इस पुस्तिका में 420 पेज हैं।

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