इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 504 के तहत दोषसिद्धि के लिए केवल गाली-गलौज के अस्पष्ट आरोप पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी द्वारा कहे गए शब्द किस प्रकृति के थे और क्या उनसे शांति भंग होने की संभावना थी।
जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जमीर अहमद की खंडपीठ ने 1993 के एक गैर-इरादतन हत्या के मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को संशोधित करते हुए तीन दोषियों की उम्रकैद की सजा को 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया, लेकिन धारा 504 के तहत उन्हें बरी कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह अपील 15 अक्टूबर 2001 को रायबरेली के सातवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी। मामला 4 मार्च 1993 की एक घटना से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता लल्ला प्रसाद और आरोपियों के बीच पुराना जमीनी विवाद था। घटना वाले दिन शाम करीब 8 बजे, जब शिकायतकर्ता अपने पिता जागेश्वर (मृतक) और गवाह ओम प्रकाश व हरि प्रकाश के साथ नसीराबाद से वापस अपने गांव अशरफपुर लौट रहे थे, तो मट्टन नाला पुल के पास आरोपियों ने उन्हें घेर लिया।
आरोप है कि लाठी-डंडों से लैस आरोपियों—भूलन (जिनकी अपील के दौरान मृत्यु हो गई), सूरजपाल, बृजलाल और जगतपाल—ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले में जागेश्वर को गंभीर चोटें आईं और 6 मार्च 1993 को जिला अस्पताल रायबरेली में उनकी मृत्यु हो गई।
हाईकोर्ट के समक्ष दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि घटना रात के अंधेरे में हुई थी और वहां रोशनी का कोई साधन नहीं था, इसलिए हमलावरों की पहचान करना संभव नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने गांव के किसी स्वतंत्र गवाह (जैसे विश्राम, गयादीन आदि) का बयान दर्ज नहीं कराया, जो अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करता है। साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों में विरोधाभास का मुद्दा भी उठाया गया।
वहीं, सरकारी वकील (AGA) ने इसका विरोध करते हुए कहा कि घायल गवाहों की गवाही विश्वसनीय है और मेडिकल रिपोर्ट से इसकी पुष्टि होती है।
कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले के कई अहम पहलुओं पर स्थिति साफ की:
1. धारा 504 IPC पर फैसला: कोर्ट ने पाया कि FIR और गवाहों के बयानों में केवल यह कहा गया कि आरोपियों ने “गाली-गलौज” की, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उन्होंने क्या शब्द कहे थे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (मो. वाजिद बनाम यूपी राज्य) का हवाला देते हुए कहा:
“केवल अभद्र या असभ्य भाषा का प्रयोग, बिना उसकी प्रकृति का खुलासा किए और बिना यह साबित किए कि उससे उकसावे की स्थिति पैदा हुई, धारा 504 IPC की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।”
इस आधार पर कोर्ट ने आरोपियों को धारा 504 के आरोपों से मुक्त कर दिया।
2. स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति: स्वतंत्र गवाहों को पेश न करने की दलील को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि गवाहों की ‘संख्या’ नहीं बल्कि उनकी ‘गुणवत्ता’ मायने रखती है। यदि घायल गवाहों (Injured Witnesses) की गवाही भरोसेमंद है, तो अन्य गवाहों की अनुपस्थिति से अभियोजन का पक्ष कमजोर नहीं होता।
3. चांदनी रात में पहचान संभव: अंधेरे में पहचान न होने की दलील पर कोर्ट ने पंचांग का संज्ञान लेते हुए noted किया कि घटना की रात ‘शुक्ल पक्ष की एकादशी’ थी और पर्याप्त चांदनी थी। चूँकि आरोपी और पीड़ित एक ही गांव के थे और एक-दूसरे को पहले से जानते थे, इसलिए उनकी पहचान करना स्वाभाविक था।
4. मेडिकल साक्ष्य: बचाव पक्ष का तर्क था कि चोटें गिरने से भी लग सकती थीं। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की राय के अनुसार चोटें लाठी-डंडों से संभव थीं और यह चश्मदीद गवाहों के बयानों से मेल खाती हैं। इसलिए, मेडिकल और मौखिक साक्ष्यों में कोई विरोधाभास नहीं है।
निर्णय: सजा में बदलाव और मुआवजा
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपियों का इरादा हत्या का नहीं था, लेकिन उन्हें ज्ञान था कि उनकी पिटाई से मृत्यु हो सकती है। इसलिए, कोर्ट ने धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
हालांकि, यह देखते हुए कि घटना को 30 साल से अधिक समय बीत चुका है और अपीलकर्ता अब वृद्धावस्था में हैं, कोर्ट ने सजा में निम्नलिखित बदलाव किए:
- सजा: उम्रकैद की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया गया।
- जुर्माना: ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए 2,000 रुपये के जुर्माने को बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति जीवित अपीलकर्ता कर दिया गया।
- मु मुआवजा: कुल जमा राशि (60,000 रुपये) मृतक जागेश्वर के कानूनी वारिसों को मुआवजे के रूप में दी जाएगी।
कोर्ट ने अपीलकर्ताओं (सूरजपाल, बृजलाल और जगतपाल) को आदेश दिया है कि वे शेष सजा काटने के लिए 15 दिनों के भीतर संबंधित अदालत में आत्मसमर्पण करें।
केस डिटेल्स:
- केस का नाम: भूलन और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील नंबर 980 ऑफ 2001
- कोरम: जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जमीर अहमद
- अपीलकर्ताओं के वकील: शिशिर प्रधान, कुंवर धनंजय सिंह, अखिलेश कुमार मिश्रा
- राज्य के वकील: सरकारी अधिवक्ता, ओंकार सिंह, राजेश श्रीवास्तव, उमा कांत गुप्ता

