उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई अभ्यर्थी यदि भर्ती प्रक्रिया के दौरान आरक्षण का लाभ नहीं लेता, तो बाद में यह कहकर नियुक्ति को चुनौती नहीं दे सकता कि उसे आरक्षण से वंचित कर दिया गया। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकल पीठ ने प्राथमिक सहायक शिक्षक (विज्ञान) पद पर चम्पावत जिले में हुई नियुक्ति को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
मामला 28 जनवरी 2026 को जारी चयन सूची से जुड़ा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि चयनित अभ्यर्थी ने उससे कम अंक प्राप्त किए थे, फिर भी उसे नियुक्ति दे दी गई। उसने चयन सूची रद्द करने, नियुक्ति निरस्त करने और अपने पक्ष में मेरिट के आधार पर नियुक्ति देने की मांग की थी।
राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि चयनित अभ्यर्थी को उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी योजना के तहत नियुक्त किया गया था। इस योजना के अनुसार राज्य सेवाओं में राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण दिया जाता है। भर्ती विज्ञापन में भी स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि क्षैतिज आरक्षण शासनादेशों के अनुसार लागू होगा।
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं को राज्य आंदोलनकारी श्रेणी का बताते हुए भी चयन प्रक्रिया के दौरान इस आरक्षण का दावा नहीं किया था। ऐसे में वह बाद में यह नहीं कह सकता कि उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिला।
न्यायालय ने यह भी कहा कि जब किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति विशेष आरक्षित श्रेणी में होती है, तो उसकी मेरिट की तुलना सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी से सीधे नहीं की जा सकती।
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने चयन प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता न पाते हुए हस्तक्षेप से इनकार किया और याचिका खारिज कर दी।

