चेक बाउंस (परक्राम्य लिखित अधिनियम) के मुकदमों की बढ़ती पेंडेंसी को कम करने और त्वरित निस्तारण सुनिश्चित करने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हाईकोर्ट ने राज्य के सभी जिला और सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिया है कि वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से समन भेजने की अनिवार्यता शामिल है।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल योगेश कुमार गुप्ता ने सर्कुलर पत्र संख्या 03/UHC/IT/NI-Digital Courts/2025 (दिनांक 5 जनवरी, 2026) जारी करते हुए निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि अब समन की तामील के लिए व्हाट्सएप और ईमेल का उपयोग किया जाए। यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के संजबीज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर व अन्य (2025) के फैसले के अनुपालन में जारी किए गए हैं।
व्हाट्सएप और ईमेल से समन भेजना अनिवार्य
हाईकोर्ट के परिपत्र के अनुसार, ट्रायल कोर्ट्स को अब ‘उत्तराखंड इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया (आपराधिक मामलों में जारी करना, तामील और निष्पादन) नियम, 2025’ के तहत इलेक्ट्रॉनिक साधनों का सहारा लेना होगा। नई प्रक्रिया के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- आरोपी का विवरण देना अनिवार्य: शिकायतकर्ता को शिकायत दर्ज करते समय आरोपी का ईमेल एड्रेस, मोबाइल नंबर और मैसेजिंग एप्लिकेशन (जैसे व्हाट्सएप नंबर) का विवरण देना होगा। इसके समर्थन में शिकायतकर्ता को एक शपथ पत्र भी देना होगा जिसमें यह सत्यापित किया जाएगा कि उक्त विवरण आरोपी के ही हैं।
- समन में ऑनलाइन भुगतान का लिंक: अदालत द्वारा जारी समन में अब सीधे ऑनलाइन भुगतान (e-Pay-Fine) का विकल्प होगा। CIS (केस इंफॉर्मेशन सिस्टम) के समन टेम्पलेट में https://pay.ecourts.gov.in/epay/ का लिंक ऑटो-जेनरेट होगा।
- घर बैठे केस खत्म करने का मौका: समन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाएगा कि आरोपी के पास शुरुआती चरण में ही ऑनलाइन सुविधा के माध्यम से चेक राशि का भुगतान करने का विकल्प है। यदि आरोपी भुगतान कर देता है और रसीद की पुष्टि हो जाती है, तो अदालत धारा 147 NI Act या BNSS की संबंधित धाराओं के तहत कार्यवाही बंद करने का आदेश पारित कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी
यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ द्वारा 25 सितंबर, 2025 को संजबीज तारी मामले में दिए गए फैसले पर आधारित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि चेक बाउंस के मामलों को दीवानी विवाद की तरह नहीं देखा जाना चाहिए और चेक की विश्वसनीयता बहाल करना कानून का मुख्य उद्देश्य है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 138 के तहत अपराध अर्द्ध-आपराधिक (Quasi-criminal) प्रकृति का है और इसका उद्देश्य प्रतिशोध लेना नहीं, बल्कि पैसे का भुगतान सुनिश्चित करना है।
त्वरित निस्तारण के लिए नए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निम्नलिखित प्रक्रियाओं को लागू करने का निर्देश दिया है:
- धारा 223 BNSS की प्रक्रिया आवश्यक नहीं: NI Act के मामलों में संज्ञान लेने से पूर्व (pre-cognizance stage) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 223 के तहत आरोपी को प्रक्रिया जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- अनिवार्य सारांश (Synopsis): धारा 138 की प्रत्येक शिकायत में इंडेक्स के तुरंत बाद एक निर्धारित प्रारूप में ‘सिनोप्सिस’ होना चाहिए, जिसे कोर्ट स्टाफ द्वारा सिस्टम में दर्ज किया जाएगा।
- समझौता (Compounding) शुल्क में बदलाव: मुकदमों को जल्दी निपटाने के लिए समझौते की लागत को संशोधित किया गया है:
- शून्य शुल्क: यदि आरोपी बचाव पक्ष की गवाही दर्ज होने से पहले चेक राशि का भुगतान करता है।
- 5% शुल्क: यदि भुगतान गवाही के बाद लेकिन फैसले से पहले किया जाता है।
- 7.5% शुल्क: यदि मामला हाईकोर्ट या सत्र न्यायालय में लंबित है।
- 10% शुल्क: यदि मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
हाईकोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि प्रत्येक शिकायत के साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रारूप में सिनोप्सिस लगाया जाए ताकि समय सीमा और कॉज ऑफ एक्शन की गणना आसानी से हो सके।

